अनियोजित शहरीकरण : पर्यावरणीय पहलु

हमारे देश में पिछले कुछ दिनों से दो प्रमुख मेट्रो पोलिटिन शहर चेन्नई और दिल्ली चर्चा में हैं। जहां तमिलनाडु में लौटते मानसून की बारिश ने चेन्नई को टापू में तब्दील कर दिया वहीं दिल्ली को डब्ल्यूटीओ ने सर्वाधिक प्रदूषित शहरों की श्रेणी में रखा है। इसके लिए दिल्ली सरकार ने ट्रैफिक एवं प्रदूषण को कम करने के लिए सम व विषम संख्या की कारों को वैकल्पिक रूप से चलाने का निर्णय लिया है। ये दोनों ही घटनाएं भारत में स्मार्ट सिटी विकसित किए जाने के दौर में एक व्यापक विश्लेषण की दरकार रखती हैं। हमें सबसे पहले चेन्नई पर विमर्श करना होगा। देश में तेजी से बढ़ रहे शहरीकरण एवं शहरों की ओर पलायन ने लगभग सभी बड़े शहरों को जनसंख्या बोझ एवं अनियोजित विकास की ओर धकेल दिया है।

चेन्नई में भी स्थिति लगभग ऐसी ही है। दरअसल चेन्नई नमभूमि एवं कच्छभूमि पर बसा शहर है जिसकी आबादी औद्योगिक विकास के चलते एक करोड़ से अधिक है, लेकिन तेजी से अनियोजित औद्योगीकरण एवं विकास ने यहां की आर्द्र जमीन को काफी नुकसान पहुंचाया है। जमीन की घटती आर्द्रता के कारण पानी को सोखने की क्षमता कम हुई है जो हमारे लिए चिंता का विषय है। हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने देश में घटती नमभूमि पर चिंता जाहिर की थी। 1 दक्षिण भारत का लगभग पूरा भाग एक प्रायद्वीपीय पठारी क्षेत्र है जो कि उच्चावच से परिपूर्ण है, लेकिन चेन्नई तटीय मैदान में स्थित है और बाढ़ जैसी समस्या इन क्षेत्रों में आसान नहीं होती है। चेन्नई के मध्य भाग में कूवम एवं दक्षिण भाग में अडयार नदी बहती है।

चेन्नई में जो भयंकर बाढ़ की विभीषिका देखी गई वह अडयार नदी में बढ़े जल स्तर का नतीजा थी। सवाल यही है कि यदि नदियों के प्राकृतिक तटों का अतिक्रमण किया जाएगा तो कभी श्रीनगर या कभी चेन्नई जैसे शहर चपेट में आते रहेंगे। मोदी सरकार की महत्वाकांक्षी स्मार्ट सिटी परियोजना को मूर्त रूप लेने में भी वही प्रश्न खड़े हो रहे हैं कि सरकार शहरों में बढ़ती अनियंत्रित जनसंख्या को कैसे रोकेगी। चेन्नई की घटना शहरीकरण पर कई सबाल उठा रही है। चेन्नई नगर निगम और तमिलनाडु सरकार आखिर एक शहर में भी बेहतर नियोजन का मॉडल प्रस्तुत नहीं कर पाई। शहर का जलनिकासी तंत्र साढ़े छह लाख की आबादी को दया में रखकर विकसित किया गया है जबकि आबादी एक करोड़ से अधिक है। शहर के 150 से अधिक जलाशयों में केवल लगभग 30 जलाशय ही शेष बचे हैं। संरचनागत विकास और औद्योगीकरण आवश्यक है, लेकिन प्रकृति व जैवविविधिता को ताक पर रखकर किया गया विकास ऐसी ही घटनाओं में वृद्धि करेगा। 2011 की जनगणना के मुताबिक चेन्नई की 29 प्रतिशत जनसंख्या स्लम क्षेत्र में निवास करने को मजबूर है। यह देश के बड़े शहरों की तस्वीर है।

चेन्नई स्लम क्षेत्र के मामले में पूरे देश में तीसरे नंबर पर है जबकि मुंबई 40 प्रतिशत स्लम जनसंख्या के साथ पहले नंबर पर, कोलकाता दूसरे नंबर पर है जहां 30 प्रतिशत जनसंख्या झुग्गी-झोपड़ी में रहने को मजबूर है। लाजिमी है स्लम क्षेत्रों के लिए नगर निगम की तरफ से कोई निर्धारित भूमि का आवंटन नहीं होता है। यह गैर नियोजित बसावट का परिणाम है जोकि पर्यावरणीय दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्रों में होती है। आज चाहे दिल्ली की यमुना नदी हो या चेन्नई की अडयार नदी सभी मानवीय अतिक्रमण की समस्या से जूझ रही हैं। शहरीकरण पर सवाल खड़े करने के क्रम में दूसरा उदाहरण दिल्ली का है। दिल्ली में न सिर्फ प्रदूषण की समस्या है, बल्कि जनसंख्या विस्फोट एवं ट्रैफिक से ओवरलोडेड दिल्ली की सड़कें इस बात का नतीजा हैं कि शहरीकरण के मानक से यह शहर काफी पीछे है। हमारे देश में पिछले कुछ दिनों से दो प्रमुख मेट्रो पोलिटिन शहर चेन्नई और दिल्ली चर्चा में हैं। जहां तमिलनाडु में लौटते मानसून की बारिश ने चेन्नई को टापू में तब्दील कर दिया वहीं दिल्ली को डब्ल्यूटीओ ने सर्वाधिक प्रदूषित शहरों की श्रेणी में रखा है। इसके लिए दिल्ली सरकार ने ट्रैफिक एवं प्रदूषण को कम करने के लिए सम व विषम संख्या की कारों को वैकल्पिक रूप से चलाने का निर्णय लिया है।

ये दोनों ही घटनाएं भारत में स्मार्ट सिटी विकसित किए जाने के दौर में एक व्यापक विश्लेषण की दरकार रखती हैं। हमें सबसे पहले चेन्नई पर विमर्श करना होगा। देश में तेजी से बढ़ रहे शहरीकरण एवं शहरों की ओर पलायन ने लगभग सभी बड़े शहरों को जनसंख्या बोझ एवं अनियोजित विकास की ओर धकेल दिया है। चेन्नई में भी स्थिति लगभग ऐसी ही है। दरअसल चेन्नई नमभूमि एवं कच्छभूमि पर बसा शहर है जिसकी आबादी औद्योगिक विकास के चलते एक करोड़ से अधिक है, लेकिन तेजी से अनियोजित औद्योगीकरण एवं विकास ने यहां की आर्द्र जमीन को काफी नुकसान पहुंचाया है। जमीन की घटती आर्द्रता के कारण पानी को सोखने की क्षमता कम हुई है जो हमारे लिए चिंता का विषय है। हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने देश में घटती नमभूमि पर चिंता जाहिर की थी। 1 दक्षिण भारत का लगभग पूरा भाग एक प्रायद्वीपीय पठारी क्षेत्र है जो कि उच्चावच से परिपूर्ण है, लेकिन चेन्नई तटीय मैदान में स्थित है और बाढ़ जैसी समस्या इन क्षेत्रों में आसान नहीं होती है। चेन्नई के मध्य भाग में कूवम एवं दक्षिण भाग में अडयार नदी बहती है। चेन्नई में जो भयंकर बाढ़ की विभीषिका देखी गई वह अडयार नदी में बढ़े जल स्तर का नतीजा थी।

सवाल यही है कि यदि नदियों के प्राकृतिक तटों का अतिक्रमण किया जाएगा तो कभी श्रीनगर या कभी चेन्नई जैसे शहर चपेट में आते रहेंगे। मोदी सरकार की महत्वाकांक्षी स्मार्ट सिटी परियोजना को मूर्त रूप लेने में भी वही प्रश्न खड़े हो रहे हैं कि सरकार शहरों में बढ़ती अनियंत्रित जनसंख्या को कैसे रोकेगी। चेन्नई की घटना शहरीकरण पर कई सबाल उठा रही है। चेन्नई नगर निगम और तमिलनाडु सरकार आखिर एक शहर में भी बेहतर नियोजन का मॉडल प्रस्तुत नहीं कर पाई। शहर का जलनिकासी तंत्र साढ़े छह लाख की आबादी को दया में रखकर विकसित किया गया है जबकि आबादी एक करोड़ से अधिक है। शहर के 150 से अधिक जलाशयों में केवल लगभग 30 जलाशय ही शेष बचे हैं। संरचनागत विकास और औद्योगीकरण आवश्यक है, लेकिन प्रकृति व जैवविविधिता को ताक पर रखकर किया गया विकास ऐसी ही घटनाओं में वृद्धि करेगा। 2011 की जनगणना के मुताबिक चेन्नई की 29 प्रतिशत जनसंख्या स्लम क्षेत्र में निवास करने को मजबूर है। यह देश के बड़े शहरों की तस्वीर है।

चेन्नई स्लम क्षेत्र के मामले में पूरे देश में तीसरे नंबर पर है जबकि मुंबई 40 प्रतिशत स्लम जनसंख्या के साथ पहले नंबर पर, कोलकाता दूसरे नंबर पर है जहां 30 प्रतिशत जनसंख्या झुग्गी-झोपड़ी में रहने को मजबूर है। लाजिमी है स्लम क्षेत्रों के लिए नगर निगम की तरफ से कोई निर्धारित भूमि का आवंटन नहीं होता है। यह गैर नियोजित बसावट का परिणाम है जोकि पर्यावरणीय दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्रों में होती है। 1 आज चाहे दिल्ली की यमुना नदी हो या चेन्नई की अडयार नदी सभी मानवीय अतिक्रमण की समस्या से जूझ रही हैं। शहरीकरण पर सवाल खड़े करने के क्रम में दूसरा उदाहरण दिल्ली का है। दिल्ली में न सिर्फ प्रदूषण की समस्या है, बल्कि जनसंख्या विस्फोट एवं ट्रैफिक से ओवरलोडेड दिल्ली की सड़कें इस बात का नतीजा हैं कि शहरीकरण के मानक से यह शहर काफी पीछे है।

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