अरुणाचल प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लागू करने की सिफारिश

केंद्र सरकार ने राष्ट्रपति से अरुणाचल प्रदेश में 24 जनवरी 2016 को राष्ट्रपति शासन लागू करने की सिफारिश की.

अरुणाचल प्रदेश में 16 दिसंबर 2015 को उस समय से राजनीतिक संकट शुरू हो गया था जब कांग्रेस के 21 बागी विधायकों ने बीजेपी के 11 सदस्यों और दो निर्दलीय विधायकों के साथ मिलकर एक अस्थाई स्थान पर आयोजित सत्र में विधानसभा अध्यक्ष नबाम रेबिया पर ‘महाभियोग’ चलाया.
विधानसभा अध्यक्ष ने इस कदम को ‘अवैध और असंवैधानिक’ बताया था.

इन विधायकों ने एक सामुदायिक केंद्र में सत्र आयोजित किया, इनमें 14 सदस्य वे भी थे, जिन्हें एक दिन पहले ही अयोग्य करार दिया गया था.

पृष्ठभूमि

•    अक्टूबर 2015 – मुख्यमंत्री ने 4 मंत्रियों को हटाया.
•    नवंबर 2015 – 47 में से 21 कांग्रेसी विधायकों ने मुख्यमंत्री को हटाने के लिए स्पीकर को नोटिस दिया.
•    गवर्नर ने विधानसभा का विशेष सत्र बुलाया.
•    स्पीकर द्वारा सत्र बुलाने से इनकार किया गया. बागी विधायकों ने गवर्नर के समर्थन से सत्र बुलाया.
•    दिसंबर 2015 – गुवाहाटी हाइकोर्ट एवं सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की गयी.
•    21 जनवरी 2016 – सुप्रीम कोर्ट ने मामला 5 जजों की संविधान बेंच को दिया.
•    24 जनवरी 2016 – केंद्र ने राष्ट्रपति शासन की सिफ़ारिश की

 

राष्ट्रपति शासन
•    राष्ट्रपति शासन (या केन्द्रीय शासन) भारत में शासन के संदर्भ में उस समय प्रयोग किया जाने वाला एक पारिभाषिक शब्द है जब किसी राज्य सरकार को भंग या निलंबित कर दिया जाता है और राज्य प्रत्यक्ष संघीय शासन के अधीन आ जाता है.
•    भारत के संविधान का अनुच्छेद-356, केंद्र की संघीय सरकार को राज्य में संवैधानिक तंत्र की विफलता या संविधान के स्पष्ट उल्लंघन की दशा में उस राज्य सरकार को बर्खास्त कर उस राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू करने का अधिकार देता है.
•    राष्ट्रपति शासन उस स्थिति में भी लागू होता है, जब राज्य विधानसभा में किसी भी दल या गठबंधन को स्पष्ट बहुमत न हो.
•    इसे राष्ट्रपति शासन इसलिए कहा जाता है क्योंकि, इसके द्वारा राज्य का नियंत्रण निर्वाचित मुख्यमंत्री के बजाय, सीधे भारत के राष्ट्रपति के अधीन आ जाता है, लेकिन प्रशासनिक दृष्टि से राज्य के राज्यपाल को केंद्रीय सरकार द्वारा कार्यकारी अधिकार प्रदान किये जाते हैं.
•    अनुच्छेद 356 को पहली बार 31 जुलाई 1959 को लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गयी केरल की कम्युनिस्ट सरकार बर्खास्त करने के लिए किया गया था.

अनुच्छेद-356

अनुच्छेद 356, केंद्र सरकार को किसी राज्य सरकार को बर्खास्त करने और राष्ट्रपति शासन लगाने की अनुमति उस अवस्था में देता है, जब राज्य का संवैधानिक तंत्र पूरी तरह विफल हो गया हो।

यह अनुच्छेद एक साधन है जो केंद्र सरकार को किसी नागरिक अशांति (जैसे कि दंगे जिनसे निपटने में राज्य सरकार विफल रही हो) की दशा में किसी राज्य सरकार पर अपना अधिकार स्थापित करने में सक्षम बनाता है (ताकि वो नागरिक अशांति के कारणों का निवारण कर सके)। राष्ट्रपति शासन के आलोचकों का तर्क है कि अधिकतर समय, इसे राज्य में राजनैतिक विरोधियों की सरकार को बर्खास्त करने के लिए एक बहाने के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है, इसलिए इसे कुछ लोगों के द्वारा इसे संघीय राज्य व्यवस्था के लिए एक खतरे के रूप में देखा जाता है। 1950 में भारतीय संविधान के लागू होने के बाद से केन्द्र सरकार द्वारा इसका प्रयोग 100 से भी अधिक बार किया गया है।

अनुच्छेद को पहली बार 31 जुलाई 1959 को विमोचन समारम के दौरान लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गयी केरल की कम्युनिस्ट सरकार बर्खास्त करने के लिए किया गया था। बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद उत्तर प्रदेश की भाजपा की राज्य सरकार को भी बर्खास्त किया गया था।

अनुच्छेद-355

अनुच्छेद 355 केंद्र सरकार अधिकृत करता है ताकि वो किसी बाहरी आक्रमण या आंतरिक अशांति की दशा में राज्य की सुरक्षा सुनिश्चित कर सके और प्रत्येक राज्य का शासन संविधान के प्रावधानों के अनुसार चलता रहे।

इस अनुच्छेद का इस्तेमाल तब किया गया जब भाजपा शासित राज्यों में गिरिजाघरों पर हमले हो रहे थे। तब के संसदीय कार्य मंत्री वायलार रवि ने अनुच्छेद 355 में संशोधन कर, राज्य के कुछ भागों या राज्य के कुछ खास क्षेत्रों को केंद्र द्वारा नियंत्रित करने का सुझाव दिया था।

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