विज्ञान एवं प्रगति : अस्थमा कारण एवं निवारण(सारांश)

अस्थमा कारण एवं निवारण

अस्थमा एक गंभीर रोग है ,जोकि आनुवंशिक और पर्यवार्नीय कारकों के मध्य होने वाली जटिल क्रियाओं के कारन होता है यह बीमारी सभी उम्र के लोगों में हो सकती है इसमें स्वांस नलिकाएं बुरी तरह प्रभाभित होती हैं स्वांस नलिकाएं फेफड़ों के माध्यम से  ऑक्सीजन  को अंदर और कार्बन डाई ऑक्साइड को बाहर करती है अस्थमा होने पर इन स्वश नालिकाओ की भीतरी सतह सूज जाती है यह बहुत ही संवेदन शील हो जाती है और जब ये स्वास नलिकाए किसी भी बेचैन करने वाले पदार्थ के संपर्क में आती है तो अति संवेदनशीलता के कारण ये तीव्र प्रतिक्रिया करती है इस प्रतिक्रिया के कारण उनमे संकुचन होता है जिसके कारण फेफड़ो में वायु की मात्रा सामान्य की अपेक्षा कम पहुचती है फलस्वरूप रोगी को खासी,सास लेने में तकलीफ एवं सीने में जकरण महसूस हूने लगती है

              जब यह प्रक्रिया बहुत ही तीव्र होती है तो स्वांश नलिकाए पूरी तरह से बंद होने लगती है इसी को दमे का दौरा कहते है इसके कारण शरीर के महत्व पूर्ण अंगो तक ऑक्सीजन नहीं पहुच पाती और यह एक गंभीर स्थिति बन जाती है इश स्थिति में मरीज़ की मृत्यु भी हो सकती है

अस्थमा के प्रमुख कारण

  • एलर्जी –

     उदाहरण- जंतु,प्रोटीन,धूल के कण, चूना,पेंट, कवक तथा तिलचट्टे आदि

  • तम्बाकू का धुआं
  • पर्यावरणीय कारक-

      उदाहरण- SO2, NO2, CO2,O3,उच्च आद्रता,पेंट, CFC,

  • संक्रमण-

    उदाहरण- जीवाणु, विषाणु

  • मोटापा
  • गर्भा अवस्था
  • तनाव एवं चिंता
  • जीन्स (genes)
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  अस्थमा के लक्षण

अस्थमा के प्रकार-

  1. एलर्जिक दमा– इस प्रकार का दमा किसी भी पदार्थ से एलर्जी के कारण उत्पन्न होता है जैसे फूलो के पराग कण,धूल,पशुओ के रोएं, एवं मौसम का बदलना
  2. बच्चों में दमा– यह दमा बच्चों में ही पाया जाता है लेकिन अक्सर देखा गया है कि इस तरह का दमा बच्चो की उम्र बड़ने के साथ साथ कम या खत्म भी हो सकता है
  3. प्रोढ़ा अवस्था में दमा – ४० वर्ष से अधिक उम्र में होता है इसके कई कारण हो सकते है जैसे कि प्रदूषण,प्लास्टिक, धूल के कण, जानवर आदि इसके अलावा मनुष्यों के द्वारा अत्यधिक मात्र में बीडी ,सिगरेट,गुटका ,तम्बाकू ,आदि का सेवन भी इसके मुख्या कारण हैं
  4. व्यायाम जनित दमा – जब लोग अपनी क्षमता से अधिक व्यायाम या शारीरिक काम करते है तो उनको साँस लेने में तकलीफ होने लगती है और समय बीतने के साथ साथ दमा की स्थिति उत्त्पन्न हो जाती है
  5. कफ जनित दमा– जब लगातार कफ की शिकायत बनी रहती है और खासी के दौरान अधिक कफ आने लगता है तो दमा की स्थिति पैदा होने लगती है
  6. उद्योग जनित दमा- यदि व्यक्ति के उद्योग, व्यवसाय की जगह पर हानिकारक रसायन,धूल,जीवाणु,विषाणु, कवक,जंतु उत्पाद ,बदलते रहने वाला तापमान और हानिकारक वायु आदि उपस्थित होते हैं ,तो दमा की स्तिथि बन्ने लगती है
  7. रात के समय दमा – ज्यादातर मध्यरात्रि से लेकर सुवह के 8 बजे तक इसका प्रभाव अधिक रहता है
  8. स्टेरॉयड रेजिस्टेंट दमा- चुकि दमा स्वाश नालिकाओ की जीर्ण सूजन से सम्बंधित बीमारी है इसलिए वर्त्तमान समय में बनाई गयी दवाए सूजन के विरुद्ध चयन की गयी है जिनमे ग्लुकोकोर्टी कोइड्स प्रमुख है यह दमा की गंभीर अवस्था में बहुत जरुरी और लगभग आखिरी दवा होती है और जरुरत पड़ने पर अपेक्षाकृत अधिक खुराक में भी लेनी पड़ती है ज्यादातर मरीजों में यह काफी अच्छा प्रभाव भी दिखाती है लेकिन दुर्भाग्य की बात यह है कि कुछ रोगियों ( लगभग 5%) को जादा खुराक देने से भी कोई ख़ास असर नहीं होता है इसलिए इस प्रकार के रोग को एक अलग श्रेणी में रखा जाता है
  9. नॉनएलर्जिक दमा- इस प्रकार का दमा किसी एक कारक के बहुत बढ़ जाने से होता है जैसे की बहुत अधिक मानशिक तनाव , बहुत तेज चलना या हसना आदि इस प्रकार का दमा बहुत अधिक धूम्रपान, गुटका,तम्बाकू, इत्यादि के सेवन की वजह से भी हो सकता है एवं इसका एक कारण फेफड़ो में लम्बे समय से संक्रमण का होना भी है

रोग के कारण उत्पन्न हुए क्रियात्मक परिवर्तन (पैथोफिजियोलोजी)- स्वांस नालिकाओ में सूजन से एओसिनोफ़िल्स का बढ़ जाना तथा लैमिना –रेटिकुलेरिस का मोटा होना शामिल है | समय बढ़ने के साथ- साथ वायुमार्ग की चिकनी मांसपेशियों की संख्या के साथ साथ उनका आकार  भी बढ़ जाता है |अन्य कोशिकाएं जैसे की T-लिम्फोसिट्स,मक्रोफैजेज और नयूत्रोफिल्स भी होती है |

            दमा की स्तिथि में सूजी हुई स्वांस नलिकाएं वातावरण में उपस्थित धूल एवं परागकणों से क्रिया करती हैं ,जिसके फलस्वरूप ये स्वांस नलिकाएं सिकुड़ जाती हैं और सामान्य से अधिक मात्र में बलगम उत्पन्न करती हैं ,जिससे सांस लेने में कठिनाई होती है

IMG_20160417_190559 (2)रोग जनन की क्रिया विधि –

दो चरण

 1- एलर्जंन संपर्क से लगभग ३० मिनट के अंदर होती है | इस प्रतिक्रिया को अर्ली एयरवे रिस्पांस कहते हैं | यह प्रतिक्रिया मस्तूल एवं बैसोफिल्स कोशिकाओं की सहभागिता एवं सक्रियता के कारन होती है | दमा के मरीजों में मस्तूल कोशिकाओं पर IgE के उच्च आत्मीयता रिसेप्टर की संख्या ज्यादा होती है ,जिससे ज्यादा संख्या में परिसंचारी IgE का क्रॉस बंधन होता है | बंधन के साथ ही यह रिसेप्टर सक्रिय होकर जटिल सिग्नलिंग की शुरुआत करते हैं एवं बहुत से जीव रसायन स्रावित करते हैं जैसे की साइटोकाइन्स,कीमोकाइंस,लिपिड व्युतपंस मध्यस्थ स्वांस नलिकाओं की जल्दी प्रतिक्रियाओं का कारण होते हैं |

IMG_20160417_190654 (2)2- इसको लेट एयरवे रिस्पांस कहते हैं , सामान्य तौर पर यह अवस्था सक्रिय मस्तूल कोशिकाओं द्वारा नए संश्लेषित अनेक मध्यस्थों जैसे कि साइटोंकाइन्स,कीमोकाइन्स,वृद्धि करक इत्यादि के कारन होता है | ये नए संश्लेषित मध्यस्थ स्वांस नलिकाओं में सूजन कारक कोशिकाओं एओसिनोफ़िल्स,बैसोफिल्स,नयूत्रोफिल्स,मेक्रोफासेस,T-कोशिकाएं एवं डेनद्रेटिक कोशिकाओं का चयन करके इस चरण को लम्बे समय तक बनाये रखते हैं | ये सभी चयनित सूजन कारक कोशिकाएं स्वांस नलिकाओं में पहुचने पर सक्रिय हो जाती हैं और फिर से सूजन करक मध्यस्थों को स्रावित करती हैं | और अपने अपने विशेष रिसेप्टर्स के साथ बंध कर सूजन एवं रेमोडलिंग उत्पन्न करती हैं |

IMG_20160417_190630 (3)दमा को नियंत्रित करने वाली दवाएं :

  • एन्हेल्ड कोर्टिकोस्टेरॉयड: इसको भाप में लेने की वरीयता दी जाती है | क्यूंकि दमा एक जीर्ण सूजन की बीमारी है |
  • लयूकोट्राईन्स मोडिफैयेर्स: इस दवा को किसी अन्य दवा के साथ दिया जाता है .जैसे की स्टेरॉयड के साथ | इन दवाओं को खासकर उन मरीजों को दिया जाता है जिन्हें दमा के साथ –साथ रायनाइटिस भी होती है |इन दवाओं का मरीज की मनोदशा पर प्रतिकूल प्रभाव पढता है ,जैसे की गुस्सा ,चिडचिढ़ापन,तनाव ,एवं मतिभ्रम इत्यादि इसलिए इनको लेते समय सावधानी एन्हेलर्सबरतनी चाहिए |
  • लॉन्ग एक्टिंग बीता अगोनिट्स: जब कम समय तक काम करने वाली बीटा -2 एगोनिट्स अच्छा परिणाम नहीं देती है तो यह दवा दी जाती है | ये दवाएं लम्बे समय तक स्वांस नलिकाओं के पेशीय तंतु पर प्रभाव डालती हैं और इस प्रकार से स्वांस नलिकाओं को लम्बे समय तक खोले रखती हैं |
  • संयोजित एन्हेलर्स: लम्बे समय तक दमा को नियंत्रित करने के लिए संयोजित एन्हेलर्स उपयोग किये जाते हैं |
  • थियोफैलीन: यह दवा टेबलेट के रूप में प्रतिदिन लेनी होती है एवं यह स्वांस नलिकाओं के पेशीय तंतु को आराम पहुंचाती है |

तुरंत आराम देने वाली दवाएं :

   इन दवाओं को बचाव की दवा भी कहते हैं | ये दवाएं प्रतिदिन नही लेनी होती ,केवल डीएनए का दौरा पढने पर ली जाती हैं

  • शार्ट एक्टिंग बीटा-2 एगोनिस्ट : यह दवा तुरंत आराम पहुँचाती है |
  • इप्राटोपियम: यह एक एंटीकोलिनजिर्क एजेंट है जोकि स्वांस नालिकाओ को बहुत जल्दी आराम पहुंचाती है और रोगी की स्तिथि में सुधार लाती है |

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