उत्तर प्रदेश : आइआइएमटी विश्वविद्यालय मेरठ उत्तर प्रदेश विधेयक, 2016 को राज्यपाल ने वापिस किया

राज्यपाल श्री राम नाईक ने दो विधेयकों को लौटाकर सपा सरकार को बड़ा झटका दिया है। उन्होंने डॉ. राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थानआइआइएमटी विश्वविद्यालय मेरठ विधेयक पर आपत्ति उठाते हरी झंडी नहीं दी। दोनों विधेयकों को पुनर्विचार के लिए वापस करते हुए राज्यपाल ने लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान संबंधी विधेयक को जहां स्वायत्तता के लिए खतरा बताया है वहीं आइआइएमटी विश्वविद्यालय संबंधी विधेयक को न्यायिक स्वतंत्रता छीनने वाला माना। इस संबंध में उन्होंने विधान परिषद के सभापति व विधान सभा के अध्यक्ष के साथ ही मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को भी पत्र लिखा है।

आइआइएमटी विश्वविद्यालय मेरठ उत्तर प्रदेश विधेयक, 2016

राज्यपाल ‘आइआइएमटी विश्वविद्यालय मेरठ उत्तर प्रदेश विधेयक, 2016’ को भी पुनर्विचार के लिए राज्य विधानमंडल के दोनों सदनों को वापस भेजते हुए सवाल उठाए हैं। कहा है कि विधेयक में विश्वविद्यालय द्वारा लगातार तीन बार अधिनियम के उल्लंघन पर राय सरकार द्वारा विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के पूर्व अनुमोदन से समाप्त कर सकने का प्रावधान है।

जबकि, संवैधानिक संस्थान व राय विधान मंडल द्वारा लिये गये किसी विधायी निर्णय के क्रियान्वयन के लिए उस पर अनुमति व अनुमोदन प्रदान करने की विधिक शक्ति विश्वविद्यालय अनुदान आयोग अधिनियम, 1956 के अंतर्गत सामान्य विधिक संस्था या विश्वविद्यालय अनुदान आयोग को प्राप्त नहीं है।

विधेयक की धारा 53 की उपधारा (3) उच न्यायालय तथा उचतम न्यायालय सहित समस्त स्तर के न्यायालयों की संविधान प्रदत्त ‘न्यायिक समीक्षा’ की शक्ति को छीन लेती है, जबकि न्यायालयों की ‘न्यायिक समीक्षा का अधिकार’ भारतीय संविधान की कई विशिष्टताओं में से एक है।

डॉ. राममनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान विधेयक, 2015

बुधवार को ‘डॉ. राममनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान विधेयक, 2015’ को वापस भेजते हुए राज्यपाल ने कहा है कि विश्वविद्यालय जैसे उच्चतर अकादमिक संस्थान ‘स्वायत्तशासी’ माने जाते हैं, ताकि वह राजनीतिक एवं प्रशासनिक हस्तक्षेप से मुक्त रहकर अपनी अकादमिक गतिविधियां संचालित कर सकें और अकादमिक स्टॉफ आदि के चयन एवं नियुक्तियों में भी स्वायत्त रह सकें।

कारण -“राजभवन भेजे गए विधेयक में संस्थान की अधिकांश प्रशासनिक शक्तियां अध्यक्ष बनाए गए मुख्य सचिव को दे दी गयी हैं। निदेशक व अध्यापकों जैसे अकादमिक पदों और अधिकारियों व कर्मचारियों की नियुक्तियों संबंधी अधिकांश शक्तियां अध्यक्ष में निहित कर दी गयी हैं। इससे संस्थान की एक विश्वविद्यालय के रूप में स्वायत्तता पूर्णतया प्रतिकूल रूप से प्रभावित होती है।”

                  राज्यपाल ने विधान परिषद सभापति व विधान सभा अध्यक्ष को लिखे पत्र में कहा है कि दोनों विधेयकों के कतिपय प्रावधानों के विधायी औचित्य और उनमें समुचित संशोधन पर विधानमंडल के दोनों सदनों द्वारा पुनर्विचार किया जाए।

Leave a Comment

Your email address will not be published.