कृषि संकट की वास्तविकता

writing

     आलेख : वृत्तचित्र

मुद्दा : कृषि संकट की वास्तविकता

किसानों की आत्महत्या के लिए गिनाए जाने वाले प्रचलित कारणों को खारिज कर रहे हैं देविंदर शर्मा

कृषि अर्थशास्त्री हमेशा कृषि आय में बढ़ोतरी के लिए फसल उत्पादन में वृद्धि के पक्ष में रहे हैं। कुछ अर्थशाष्त्री कृषि संकट के लिए कम उत्पादकता को दोष देते हैं। हम प्राय: कहते रहे हैं कि ग्लोबलाइजेशन के दौर में किसान तभी बचे रह सकते हैं जब वे विश्व स्तर पर प्रतिस्पर्धी होंगे। अमेरिका या चीन जैसे देशों में जो किसान फसल की ऊंची पैदावार के स्तर को नहीं छू पाते उन्हें आत्महत्या करने के अलावा दूसरा कोई चारा नहीं होता। चार दशक हो गए अर्थशास्त्रियों की एक ही तरह की बातों को सुनते हुए कि किसान उत्पादकता बढ़ाने के लिए तकनीक का प्रयोग करें, उत्पादन लागत घटाएं, फसल विविधिकरण को अपनाएं, सिंचाई क्षमता को बढ़ाएं और बिचौलियों के चंगुल से बचने के लिए इलेक्ट्रॉनिक ट्रेडिंग के प्लेटफॉर्म पर जाएं। इन सुझावों को लोग सालों से सुनते आ रहे हैं।

उनकी मूलत: यही धारणा है कि कृषि संकट मुख्य रूप से किसानों की देन है, क्योंकि उन्होंने आधुनिक तकनीक और फसल की नई किस्मों का उपयोग नहीं किया है। वे बैंक कर्ज का उपयोग करना नहीं जानते हैं। वे लागत को कम नहीं कर पा रहे हैं और परिणामस्वरूप उनका बकाया कर्ज बढ़ता जा रहा है। बीते बीस सालों में करीब 3.2 लाख किसानों ने आत्महत्या की है। बेमौसम बारिश और ओलावृष्टि और उसके बाद सूखे की समस्या ने 2015 में कृषि संकट को काफी विकट बना दिया था। परिणामस्वरूप उत्तर प्रदेश, हरियाणा, मध्यप्रदेश, पंजाब और महाराष्ट्र में किसानों की आत्महत्या की घटनाओं में असाधारण बढ़ोतरी देखी गई। 2015 में किसानों की वार्षिक मृत्यु दर पहले के 42 से बढ़कर 52 हो गई। इन दिनों पंजाब किसानों के कब्रगाह के नए ठिकाने के रूप में उभरा है।

2015 में करीब-करीब 449 किसानों ने आत्महत्या की। संसद के अनुसार इस साल 11 मार्च तक पंजाब में 56 किसानों ने अपना जीवन खत्म कर लिया। अनाज के भंडार के नाम से मशहूर पंजाब किसानों की आत्महत्या के मामले में महाराष्ट्र के बाद देश में दूसरे स्थान पर है। यदि सिंचाई की सुविधाओं का अभाव और निम्न फसल उत्पादकता कृषि संकट का एक कारण है तो क्यों किसानों में इस कदर निराशा छा गई है कि वे आत्महत्या के लिए विवश हो गए हैं? उन्हें तो पंजाब जैसे प्रगतिशील राज्य में पूरी तरह खुशहाल जीवन व्यतीत करना चाहिए। किसानों की आय बढ़ाने के लिए जितने भी नुस्खे बताए जाते हैं वे पूर्णत: गलत हैं। कृषि अर्थशास्त्री सारा ठीकरा किसानों के सिर पर फोड़ते आ रहे हैं। एक ऐसे राज्य में जहां 98 फीसद खेती सिंचाई के दायरे में है और जहां फसल पैदावार अंतरराष्ट्रीय मानकों को पूरा करती है, मुङो ऐसा कोई कारण नजर नहीं आता कि वहां के किसान आत्महत्या करें।

आर्थिक सर्वेक्षण 2016 के अनुसार गेहूं की प्रति हेक्टेयर पैदावार 4500 किग्रा रही, यह अमेरिका में प्रति हेक्टेयर गेहूं की उपज के बराबर है। पंजाब में प्रति हेक्टेयर धान की उत्पादकता 6000 किग्रा रही। यह चीन में प्रति हेक्टेयर धान की उत्पादकता के करीब-करीब बराबर है। फसल उत्पादकता की यह ऊंची दर और सिंचाई के प्रचुर साधन होने के बाद भी पंजाब के किसानों को आत्महत्या क्यों करनी चाहिए? यहां चंडीगढ़ स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ डेवेलपमेंट एंड कम्युनिकेशन के प्रोफेसर एचएस शेरगिल द्वारा किए गए एक अध्ययन की कुछ बातों को ध्यान देना जरुरी है। उन्होंने मशीनीकरण, रासायनिक प्रौद्योगिकी, पूंजी उपलब्धता, उत्पादकता आदि मानकों के आधार पर पंजाब की कृषि को विकसित देशों की कृषि से तुलना की है। अध्ययन के अनुसार प्रति एक हजार हेक्टेयर पर टैक्टरों की संख्या पंजाब में जहां 122 पाई गई है, वहीं अमेरिका में 22, ब्रिटेन में 76 और जर्मनी में 65 है।

प्रति हेक्टेयर खाद के प्रयोग में पंजाब 449 किग्रा के साथ शीर्ष पर है, जबकि अमेरिका में प्रति हेक्टेयर 103 किग्रा, ब्रिटेन में प्रति हेक्टेयर 208 किग्रा और जापान में प्रति हेक्टेयर 278 किग्रा खाद का प्रयोग होता है। पंजाब में सिंचित क्षेत्र 98 फीसद है, जबकि अमेरिका में 11.4 फीसद, ब्रिटेन में दो फीसद और जापान में 35 फीसद है। पंजाब में गेहूं, चावल और मक्का के 7633 किग्रा प्रति हेक्टेयर वार्षिक पैदावार के साथ शीर्ष पर है। दूसरी ओर अमेरिका 7238 किग्रा प्रति हेक्टेयर, ब्रिटेन 7008 किग्रा प्रति हेक्टेयर, फ्रांस 7460 किग्रा प्रति हेक्टेयर और जापान 5920 किग्रा प्रति हेक्टेयर के साथ काफी पीछे है। यदि पैदावार में बढ़ोतरी को समृद्धि का एक मानक बनाएं तो पंजाब में किसानों की आत्महत्या को कोई कारण नजर नहीं आता। दरअसल अर्थशास्त्री यह मानने को तैयार नहीं हैं कि किसानों को उनकी पैदावार की मिलने वाली निम्न कीमत ही कृषि संकट के लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार है। 1970 में गेहूं का खरीद मूल्य 76 रुपये प्रति क्विंटल था। 2015 में गेहूं के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य 1450 रुपये प्रति क्विंटल तय किया गया।

पिछले 45 सालों में इसमें 19 गुना बढ़ोतरी हुई है। अब इसी काल में दूसरे क्षेत्रों की आय में वृद्धि के आंकड़े देखें: सरकारी कर्मचारियों के वेतन (सिर्फ मूल वेतन और महंगाई भत्ते में) में 120 से 150 गुना बढ़ोतरी हुई है। कॉलेज/ विश्वविद्यालयों के शिक्षकों के वेतन में 150 से 170 गुना बढ़ोतरी हुई है। स्कूली शिक्षकों का वेतन तो 280 से 320 गुना बढ़ गया है। सातवें वेतन आयोग में एक चपरासी का वेतन प्रति महीने 18000 रुपये तय किया गया है। ऐसे समय जब ठेका मजदूर की मासिक मजदूरी दस हजार रुपये तय की गई है तब पंजाब के किसानों की औसत मासिक आय बहुत ही कम नजर आती है। कृषि लागत और मूल्य आयोग (सीएसीपी) के अनुसार गेहूं और चावल की पैदावार से पंजाब के किसानों को प्रति हेक्टेयर तीन हजार रुपये आय होती है। इस पैसे से जीवन गुजारना कठिन है।

सवाल यह खड़ा होता है कि जब पंजाब के किसानों की कृषि उत्पादकता अमेरिकी किसानों की तुलना में अधिक है तब उनकी आय इतनी कम क्यों है? समाज के दूसरे क्षेत्र में वेतन वृद्धि को देखते हुए यदि इसी कालखंड में खरीद मूल्य में सौ गुना बढ़ोतरी को न्यूनतम मानदंड बनाया जाए तो गेहूं की कीमत प्रति क्विंटल 7600 रुपये होनी चाहिए। गेहूं की यह वैध कीमत है जिसे किसानों को देने से इंकार किया जाता रहा है। कृषि अर्थशास्त्रियों को यह मानना होगा कि कृषि संकट के लिए आय वितरण में भारी असंतुलन जिम्मेदार है। स्पष्ट है कि पहली जरूरत यह सुनिश्चित करने की है कि किसानों की मासिक आय कम से कम निचले स्तर के सरकारी कर्मचारी के मासिक वेतन के बराबर हो।

Comments (2)

  1. Gaurav
    May 08, 2016 at 2:40 pm

    बेहतरीन प्रयास ,धन्यवाद

  2. राय
    May 10, 2016 at 7:55 pm

    मेरा भी यही मानना है की किसानो को भी एक निश्चित मासिक आय निर्धारित होनी चाहिये.

Leave a Comment

Your email address will not be published.