नक्सलवाद : सामाजिक एवं आंतरिक सुरक्षा चुनौती

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नक्सली आंदोलन की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

 सत्ता बंदूक की गोली से निकलती है’ के प्रतिपादक माओत्से तुंग की विचारधारा पर चलने वालो नक्सलवाद ‘नक्सलबाड़ी’ शब्द सिलीगुड़ी के निकट एक गांव नक्सलबाड़ी जिला से निकला है। यह स्थान नेपाल से 4 मील, बांग्लादेश से 14 मील, सिक्किम से 30 मील और तिब्बत से 80 मील की दूरी पर स्थित है। इस क्षेत्र में 256 वर्गमील भूमि पर फैले नक्सलबाड़ी, खारावाड़ी और फासीदेवा तीन स्थान प्रमुख महत्व रखते हैं।
यह क्षेत्र 1967 में साम्यवाद प्रभावित किसान सभा के भूमि संबंधी विद्रोह के कारण चर्चित हो गया था, नक्सलबाड़ी गाँव में 2 मार्च, 1967 को एक स्थानीय जमींदार के सशस्त्र गुंडों ने बिगुल नामक किसान को बेरहमी से पीटा, उसके दूसरे ही दिन किसान आंदोलकारियों ने जमीन के एब बड़े भूखंड को लाल झंडों से घेर कर खुदाई शुरू कर दी।
पुलिस ने दमनात्मक कार्यवाही शुरू की। 23 मई को किसानों ने एक इंस्पेक्टर की हत्या कर दी, बदले में पुलिस ने 9 महिलाओं एवं एक बच्चे को मार गिराया, जमींदारों को गर्दनें काटकर पेड़ों पर लटकाने की खबरें आने लगीं। विद्रोहियों ने सरकारी दफ्तरों में रखे जमीन के कागजात जला दिए। जमींदारों द्वारा सताए गए भूमिहीन एवं जातिप्रथा के शिकार लोग आंदोलन में कूद पड़े और आंदोलन भड़क उठा। इस प्रकार खूनी संघर्ष का प्रारंभ हो चुका था, जो आज भी जारी है।
चारू मजूमदार, कानू सान्याल और मुजीबुर्रहमान  के नेतृत्व में शुरू हुए इस आंदोलन में भू—अपहरण, फसलों को काट लेना, हिंसा, आतंक, आगजनी, लूटमार गोली मारने की घटनाओं के कारण कानून एवं व्यवस्था पूर्णतः समाप्त हो गई। पुलिस प्रशासन कार्य करने में असमर्थ हो गया। अव्यवस्था एवं भ्रम की स्थिति में स्थानीय विद्रोही किसानों को प्रोत्साहित किया गया और वे सामान्य सरकार स्थापित करने की स्थिति में पहुंच गए।

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इसका परिणाम था कि चार माह की अवधि के भीतर किसान सभाओं की सदस्य संख्या 4 लाख तक पहुंच गई। यघपि कुछ समय पश्चात् पश्चिम बंगाल की संयुक्त मोर्चा सरकार उन्हें दबाने में सफल रही। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (ICP) से अलग हुए धड़े ने 1964 सीपीआई (मार्क्सवादी लेनिनवादी) का गठन किया और इन लोगों ने ही नक्सली आंदोलन आंदोलन की नींव रखीं। इनमें सबसे प्रमुख थेः—
बंगाल के जमींदार परिवार के चारू मजूमदार। संयोगवश यह आंदोलन ऐसे समय पर फूटा जब सीपीआई (एम. एल.) ने बांग्ला कांग्रेस के साथ पश्चिम बंगाल में गठबंधन सरकार का गठन किया। बंगाल में उभरे इस आंदोलन का प्रभाव आंध्र प्रदेश, केरल एवं उड़ीसा तक देखा गया। मेडिकल एवं इंजीरियरिंग के सैकंड़ों छात्र पढ़ाई छोड़कर आंदोलन में कूद पड़े।
कोलकाता में एक मई 1969 को सीपीआई (एमएल) की विशाल रैली का आयोजन किया गया। इसमें कानू सान्याल ने पार्टी का घोषणा—पत्र जारी किया। पश्चिम बंगाल के बाद केरल में नक्सलवादी गतिविधियाँ शुरू हुईं, क्रांतिकारियों ने मालाबार क्षेत्र को लघु अल्बानियो बनाने का निश्चय करके बानेड़ जिले की भीतरी प्रदेश आतंकवादी गतिविधियों के लिए आधार के रूप में चुना।
पालाघाट जिले के जंगलों में उग्रवादी कम्युनिस्टों को गुरिल्ला युद्ध का प्रशिक्षण दिया गया, उग्रवादियों का पुलिस स्टेशन से हथियार प्राप्त करने, हिंसात्मक कार्यवाहियों के द्वारा भय का वातावरण पैदा करना मुख्य उद्देश्य रहा। प्रारंभिक दौर में नक्सली आंदोलन प्रभावपूर्ण रहा। मई, 1970 में सीपीआई (एमएल) की एक गुप्त बैठक हुई तथा इसमें चारू मजूमदार को महासचिव चुना गया।

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1971 में पूर्वी पाकिस्तान से (बांग्लादेश) युद्ध के दौरान नक्सलियों के खिलाफ सेना ने कार्यवाही की, इसके बाद 1972 में कोलकाता पुलिस ने चारू मजूमदार को गिरफ्तार कर लिया। 16 दिन हिरासत में रहने के दौरान संदिग्ध परिस्थितियों में मजूमदार की मृत्यु हो जाने के बाद आंदोलनकारियों में टकरावा शुरू हो गया। नागभूषण पटनायक के द्वारा आंदोलन की कमान संभाली गई, भ्रम के बाद भी नक्सली धारा में आकर्षण कम नहीं हुआ।
1973 में बिहार एवं आंध्र प्रदेश के तेलंगाना क्षेत्र में नए सिरे से गुरिल्ला संघर्ष फूटा।1970 से 75 के मध्य इसने बुद्धिजीवियों को काफी प्रभावित किया जिससे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी आंदोलन को समर्थन मिलने लगा। अगस्त 1974 को नोम चोमस्की, सीमोन द बुआ सहित दुनियाभर के तीन सौ से अधिक बुद्धिजीवियों ने तत्कालीन केंद्र सरकार को पत्र लिखकर नक्सलियों के साथ हो रहे अमानवीय व्यवहार के प्रति ऐतराज जताया और उनकी रिहाई की मांग की, उस समय 5,000 से अधिक नक्सली और उनके समर्थक जेलों में बंद थे। जून 1975 में देश में आपातकाल लगाए जाने के बाद नक्सली आंदालन स्थगित हो गया।
सन् 1977 में सत्ता परिवर्तन के साथ ही नक्सली आंदोलन का नया दौर शुरू हुआ। आंध्र प्रदेश के करीमनगर में किसानों का विद्रोह हुआ और नक्सलियों ने तेलंगाना द्वोत्र के आठ जिलों में जंगल में रहकर संघर्ष करने का निर्णय किया और पश्चिम बंगाल, उड़ीसा व बिहार में अपने लिए नई जमीन तलाशनी शुरू की। इसी समय इंजीनियरिंग की पढ़ाई छोड़कर आंदोलन में शामिल हुए विनोद मिश्र ने आंदोलन की कमान संभालने के बाद यह स्वीकार किया कि संसदीय राजनीति का रास्ता ही सही रास्ता है, इसलिए आंदोलन के प्रमुख नेता नागभूषण पटनायक को भी परोक्ष रूप से संसदीय राजनीति के समक्ष झुकना पड़ा था।

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नक्सली आंदोलन का नया दौर पीपुल्स वार गु्रप के गठन के बाद शुरू हुआ। ऑल इंंडिया कम्युनिस्ट निवोल्यूशनरी की ओर्डिनेशन कमेटी के सदस्य कोडापल्ली सीतारमैया ने 12 अप्रैल, 1980 को इसका गठन किया। सीतारमैया एक कुशल संगठनकर्ता सिद्ध हुए। उन्होंने सफलतापूर्वक प्रचार किया। 1977 में सीपीआई (एमएल) ने एक विशाल रैली की, 1999 में बिहार में सीपीआई (एमएल) पार्टी यूनिटी का पीपुल्स वार गु्रप में विलय हुआ और 2000 में आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, झारखंड और बिहार में बड़े पैमाने पर नक्सली हिंसा हुई, सुरक्षाबलों से मुकाबला करने के लिए पीपुल्स गुरिल्ला आर्मी का गठन किया।
2001 में नक्सली—माओवादी संगठनों ने एक समन्वय समिति बनाकर दक्षिण एशिया में आंदोलन को उग्र करने का निर्णय किया। अक्टूबर 2004 में पीपुल्सवार ग्रुप और माओवादी कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ (माओवादी) अस्तित्व में आ गई है। अन्य सभी नक्सली गुटों से भिन्न चुनावों में हिस्सा लेते हुए धीरे—धीरे अपने आपको एक राजनीतिक पार्टी के रूप में ढालने का काम माकपा (लिबरेशन) ने किया है। इस प्रकार नक्सली आंदोलन औपचारिक—अनौपचारिक रूप में अपने पैर पसार रहा है।

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