नाटी लोक नृत्य : गिनीज बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड

हिमाचल प्रदेश के कुल्लू जिले के नाटी लोक नृत्य को वर्ष 2016 के जनवरी माह में गिनीज बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड में स्थान दिया गया. कुल्लू दशहरा महोत्सव के दौरान 26 अक्तूबर 2015 को प्राइड ऑफ कुल्लू के अंतर्गत बेटी बचाओ थीम पर एक साथ 9892 महिलाओं ने भाग लिया था.इस आधार पर इस लोक नृत्य को सबसे बड़े लोक नृत्य के रूप में गिनीज बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड में जगह दी गई. यहाँ बड़े लोक नृत्य का तात्पर्य नृत्य में शामिल हुए लोगों से है.

ज्ञात हो बेटी बचाओ थीम पर ही अक्तूबर 2014 में भी दशहरा महोत्सव का आयोजन किया गया था इस दौरान 8760 महिलाओं ने इस लोक नृत्य में भाग लिया जिसे लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड में स्थान मिल चुका है. कुल्लू दशहरा सदियों पुराना त्योहार है और यह उत्सव देश के बाकी हिस्सों उत्सव खत्म हो जाने के बाद विजया दशमी के दिन शुरू होता है.

हिमाचल में लोकनृत्य की अपनी ही एक अनोखी परम्परा है। प्रदेश के हर जिले में अलग-अलग भाषाएं, संस्कृति, त्यौहार, मेले, उत्सव, कलाएं अपने आप में बेजोड़ हैं, वहीं प्रदेश के हर जिले का लोकनृत्य भी अपनी एक विशेष महत्ता लिए है। प्रदेश के हर जिले में जहां शादी-ब्याह, तीज-त्यौहार, मेले व अन्य उत्सवों में अपने पारम्परिक परिधानों व आभूषणों से सुशोभित होकर लोकनृत्य की मिसाल अलग-अलग देखने को मिलती है। दूसरी ओर इन्हीं लोकनृत्यों को भिन्न-भिन्न नामों से जाना जाता है। इस बार हम हिमाचल लोक-संस्कृति में आपको प्रदेश के लोकनृत्यों के बारे में विस्तार से अवगत करवाएंगे।

पारम्परिक वेशभूषा से सुशोभित हिमाचली नाटी का एक दृश्य

          पारम्परिक वेशभूषा से सुशोभित हिमाचली नाटी का एक दृश्य

हिमाचल प्रदेश में एकल और सामूहिक दोनों तरह के नृत्य होते हैं। एकल नृत्य बिलासपुर, सोलन, सिरमौर और शिमला की पहाडिय़ों में अधिक प्रचलित हैं। बिलासपुर और सोलन में इसे गिद्धाकहा जाता है, जबकिसिरमौर और शिमला की पहाडिय़ों के कुछ क्षेत्रों में इसेमुजंरा कहा जाता है। अन्य एकल नृत्य प्रेक्षणी, नटरंभ और चेरी आदि भी हैं। नतृक और गायक एक गोले में बैठते हैं। ज्यों-ज्यों संगीत और गीत की गति तीव्र होती है एक व्यक्ति गोले से निकलकर केंद्र में आकर खड़ा हो जाता है। संगीत की ताल तथा गायकों की तालियों और पूरे शरीर को कलात्मक ढंग से हिलाता है। यह कुछ समय तक चलता है और फिर वह वापस गोल दायरे में आकर बैठ जाता है। इसी समय दूसरा व्यक्ति दायरे के केंद्र में पहुंचकर पहले व्यक्ति की तरह हैं। अपनी कला को अधिक आकर्षक बनाने के लिए कभी-कभी नर्तक सिर पर पानी भरा लोटा रख कर नचाता है। यह नृत्य थाली नृत्य कहलाता है यह नृत्य सिरमौर, शिमला की पहाडिय़ों तथा पड़ोसी उत्तर प्रदेश में प्राय: खुले मैदान में ही किया जाता है परतुं रात्रि  को अथवा खराब मौसम में ये बरामदे में या किसी खुले कमरे में भी किए जाते हैं। सामान्यत: स्त्रियों और पुरुष अलग-अलग नृत्य समारोह आयोजित करते हैं। सामाजिक मिलन के अवसरों पर यथा विवाह, मेले, त्यौहार आदि इनके लिए उपयुक्त अवसर होते हैं।
सामूहिक नृत्यों के अनेक भेद हैं जिनमें से कुछ में तो सैकड़ों लोग एक साथ भाग लेते हैं। इस प्रकार के नृत्य खुले स्थानों पर यथा मंदिर के आंगन में अथवा गांव के खलिहान में किए जाते हैं। नतृक एक वृत्त बनाते हैं जिससे उनको गोलाकार तथा अद्र्धगोलाकार रूप में गतिशील होने का अवसर मिलता है। कभी-कभी वे हवा में भी अपने बाजू लहराते हैं। विशेष अवसरों पर प्रमुख नर्तक अपने सिर पर कलगी धारण करता है, विशिष्ट पोशाक पहनता है और जाजनी अर्थात नृत्य के आभूषण धारण करता है। वे अपने हाथों में तलवारों, डांगरा अर्थात नृत्य की कुल्हाडिय़ां अथवा रूमाल भी धारण करते हैं।
कुल्लू में ऐसे नृत्यों को नाटी कहा जाता है तथा शिमला के पहाड़ों में इसे जी अथवा माला नृत्य कहा जाता है। नाटी मूलत: अव्यावसायिक लोगों के लिए होती है जो कि केवल अपने आनंद के लिए नाचते हैं, दर्शकों को दिखाने के लिए नहीं। शास्त्रीय नृत्यों के मुकाबले में इनमें कोई कठोर नियम नहीं होते और थोडा परिवर्तन सदा स्वीकार्य  होते हैं। प्राय: सबसे अनुभवी और बुजुर्ग नर्तक ही नर्तकों की पंक्ति का नेतृत्व करता है परंतु आजकल सबसे प्रभावशाली अथवा धनी व्यक्ति को यह विशेषाधिकार दे दिया जाता है।
कुल्लू का एक और प्रसिद्ध नाच, काठी है। पतझड़ की फसल की कटाई के पश्चात् स्त्रियां और पुरुष इसके माध्यम से आनंद लेते हैं। अपनी रंग-बिरंगी वेश-भूषा में वे खुले मैदान में एकत्रित होते हैं और चांदनी रात में बांहों में बांहे डालकर नर्तक एक गोला लेते हैं और धीरे-धीरे सुंदर ढंग से अंग परिचालन करते हैं। शीघ्र ही जब है तब नारियां अपने साथी पुरुष नर्तकों को और जोर से मस्ती में से ताल देती है। नृत्य की गति का गीत की भावना से गहरा संबंध रहता है तथा गीत प्रेम से लेकर ऐतिहासिक घटनाओं तथा देवताओं को श्रद्धांजलि अर्पण करने तक के होते हैं।
बूढ़ा नृत्य  सिरमौर का एक प्रमुख नृत्य है। वह 10 से 15 व्यक्तियों के दल में किया जाता है जिसमें संगीतकार भी सम्मिलित रहते हैं। संगीत वाद्य हुरकी को बजाया जाता है। तीन या चार व्यक्ति हुरकी बजाते हैं। और शेष अपनी कुल्हाडिय़ां जिन्हें डांगरी कहते हैं को लहराते हैं हुए नाचते हैं। अतीत में जीते हुए युद्धों के नायकों की वीरता की गाथा गाई जाती हैं और वीरगति प्राप्त  करने वालों के गीत गाए जाते हैं। इस नृत्य की प्रमुख विशेषता है शरीर के अंगों की मुक्त गतिशीलता।

रंग-बिरंगे वस्त्रों को पहन कर और चांदी के आभूषणों को धारण कर नृत्य करते गद्दी-गद्दनें

रंग-बिरंगे वस्त्रों को पहन कर और चांदी के आभूषणों को धारण कर नृत्य करते गद्दी-गद्दनें

गद्दियों में पुरुष और स्त्रियां अलग-अलग नाचती हैं। पुरुष सार्वजनिक स्थलों पर नाचते हैं जबकि स्त्रियां अपने घरों के अहातों में। 25 से 30 नतृक एक गोलदायरा बना लेते हैं और ढोलक की थाप तथा शहनाई के मधुर संगीत के साथ धीमा तालयुक्त अंग-संचालन प्रारंभ करते हैं। उनकी स्त्रियां घर के बने रंग-बिरंगे वस्त्रों को पहन कर और चांदी के आभूषणों को धारण करके नर्तक दल के चारों ओर बैठकर उसे प्रोत्साहित करती है। शीघ्र ही नाच तेज हो जाता है और आओ मिलकर, नांचे तथा भला राए  अर्थात हम नाच कर खुश हैं की ऊंची आवाजें सारे वातावरण में गूंज उठती है। नर्तक गोलाकार नाचते हैं और उनके चोले खुले छातों की तरह लगते हैं। देसी शराब लुगदी उन्हें मस्त बनाए रखती है और वे देर रात तक गद्दी प्रेमियों की साहसिक गाथाओं को गाते हैं जिनमें गद्दी प्रेमी-युगल कुंजू और चंचलों का गीत प्रसिद्ध हैं जिन्हें चंबा का रोमियों और जुलियट कहा जा सकता है।

किन्नौर क्षेत्र भी अपने नृत्यों के लिए प्रसिद्ध है। किन्नौर में तीन प्रकार के लोक-नृत्य हैं। इनमें सबसे लोकप्रिय क्यांग है। इस नृत्य में स्त्रियां और पुरुष अद्र्धवृत्ताकार खड़े होते हैं और बजंतरी अद्र्धवृत के केंद्र में खड़ होते हैं। एक अधेड़ आयु का पुरुष, पुरुषों का नेतृत्व करता है और अधेड़, स्त्री, स्त्रियों का। नृत्य आगे बढ़ता है एक पूर्ण वृत्त बना लिया जाता है जिसमें हर व्यक्ति अपने दांई ओर के तीसरे व्यक्ति का हाथ पकड़ता है। यह गोलाकार समूह धीरे-धीरे घूमता है और अन्तत: नेता हो, हो, हो , हो,  चिल्लाता है और प्रत्येक नर्तक घुटने को मोडक़र आगे को झटका लगाता है। नर्तकियां गाती रहती हैं और पहले दो स्त्रियां गाती हैं और शेष सब उनके पीछे दोरहाती है जाती हैं। यह नृत्य घंटों चलता है।

जनजातीय क्षेत्र किन्नौर में पारम्परिक परिधानो व आभूषनों सहित नृत्य करते कलाकार

जनजातीय क्षेत्र किन्नौर में पारम्परिक परिधानो व आभूषनों सहित नृत्य करते कलाकार

दूसरी प्रकार का नृत्य बाक्यांग कहलाता है। जिसमें नर्तकों की दो या तीन पंक्तियों रहती है। एक पंक्ति  के नर्तक तालयुक्त गति से  आगे बढ़ते हैं और दूसरी पंक्ति के नर्तक पीछे हटते हैं इसके पश्चात इन अंग-परिचालनों को विपरीत दिशा में दोहराया जाता है। यह नृत्य प्राय: स्त्रियां ही करती हैं।
किन्नौर का तीसरी तरह का नृत्य बोन्यागॉंयू कहलाता है। यह एक प्रकार का मुक्त नाच होता है जिसमें पुरुष बजन्तरियों की लय पर अथवा किसी चुने हुए वाद्य-यंत्र की लय पर नाचते हैं। यह मूलत: पुरुषों का नाच है जिसमें स्त्रियां कभी-कभी बाहर रहकर गा कर सहयोग दती हैं।
खुले मैदान में किए जाने वाले अन्य महत्वपूर्ण नृत्य हैं घुगती और बीसु। बीसु नृत्य सिरमौर और शिमला की ऊपरी पहाडिय़ों में प्रचलित है। यह आमतौर पर मेलों में आयोजित किया जाता है जहां इसमें एक साथ सैंकड़ों लोग भाग लेते हैं। यह नृत्य प्राय: खुण्ड लोग आयोजित करते हैं। खुण्ड एक विशेष गांव के युद्धप्रिय लोग हैं। ये अपनी बहादुरी के कारनामों के लिए प्रसिद्ध हैं। जब ये लोग मेले में जाते हैं तो पूरा का पूरा गांव जाता है। मेले को जाते समय ये ढोलक की थाप, नगाड़े तथा तुरही की आवाज के साथ मेले में जाते हुए नाचते हैं और आगे बढ़ते हैं। प्रत्येक नर्तक के हाथ में तलवार, डांगरा, लाठी, रूमाल या खुखरी रहती है। जागरा त्यौहार के अवसर पर रात्रि को नाचते हुए ये हाथों में जलती मशालें लेकर नाचते हैं। नाच के पूरे जोश के दौरान एक नर्तक जोर-जोर से चिल्लाता है बलि जाओ एस बिरसू की ताई अर्थात कितना सुन्दर एवं आकर्षक नृत्य है और ऐसा कहकर और भी जोश से नाचता है। अन्य नर्तक ऊंची आवाज में टो कहकर उसका उत्तर देते हैं। कभी-कभी बिरसु गीत भी गाया जाता है। जब नर्तक मेले के स्थल पर पहुंचते हैं तो कुछ दूर तक नाचते हैं और फिर बिखर जाते हैं। प्राय: सायंकाल वापसी के समय कुछ समय के लिए वे फिर यही नृत्य करते हैं।
घुगती नृत्य मूलत: युवकों का नृत्य है। नर्तक एक-दूसरे के पीछे खड़े होते हैं और अपने से आगे वाले के कोट को पकड़े रहते हैं। नेता घुगती गीता गाता हुआ आगे को छलांग लगाता है और टेढ़ा-मेढ़ा चलता है। दूसरे भी उसके पीछे बल खाते चलते हैं।

बौद्ध भिक्षुक लाहौल स्पीति और ऊपरी किन्नौर के मठों में मुखौटों वाले नृत्य करते हैं। जिन्हें देखने के लिए आस-पास के गांवों के लोग आते हैं। ये नृत्य मठों के प्रांगण में आयोजित किए जाते हैं और भोर से लेकर सायंकाल तक चलते हैं। इनमें अच्छाई और बुराई के बीच युद्ध के विभिन्न सोपान अंकित किए जाते हैं। नर्तक और संगीतकार लामा ही होते हैं।
बौद्ध नृत्य प्राय: तुरहियां बजाते, झांझ और गोलकार नगाड़ों के संगीत के साथ प्रारम्भ होते हैं। नर्तक मुखौटे पहन कर उपस्थित होते हैं। इनमें से दो ने शेरों के मुखौटे और वस्त्र पहने होते हैं। नृत्य में शेर पर काबू पाने का दृश्य दिखाया जाता है तथा शेर बुरी आत्मा का प्रतीक होता है। यह लामाओं का शैतान का नाच कहलाता है।
हिमाचल प्रदेश के प्रमुख लोकनृत्यों की सूची निम्र प्रकार से दी जा सकती है-
1. नाटी: यह नृत्य कुल्लू, शिमला और सिरमौर में लोकप्रिय है।
2. मुंजरा: यह एकल नृत्य घरों में होता है। यह नृत्य शिमला और सिरमौर में अधिक होता है।
3. ढीली नाटी: यह नृत्य शिमला, कुल्लू, सिरमौर तथा मण्डी में लोकप्रिय है। यह धीमी गति का नृत्य है जिसमें अनेक वाद्यों का प्रयोग होता है।
4. गीह नृत्य: यह सिरमौर के गिरिपार क्षेत्रों में तथा शिमला के ठियोग, बलसन, जुब्बल, कोटखाई और चौपाल आदि जनपदों में लोकप्रिय है।
5. हुडक नृत्य: शौर्य और पराक्रम को दर्शाने वाला यह नृत्य शिमला के चौपाल जनपद में लोकप्रिय है और हुडक वाद्ययन्त्र के साथ किया जाता है। यह डमरू जैसा होता है। यह शिव के ताण्डव का ही एक रूप माना जाता है।
6. ठोडा नृत्य : सिरमौर के जनपदों में योद्धा जाति खुंदों द्वारा किया जाने वाला यह एक प्रकार का युद्ध नृत्य है। यह बीशू के अवसर पर किया जाता है।
7. करथी नृत्य : यह कुल्लू का वीररस प्रधान नृत्य है।
8. खड़तायर नृत्य : यह भी कुल्लू का धार्मिक, वीररसपूर्ण नृत्य है। यह देवयात्रा पर तलवार के साथ किया जाता है।
9. रूंझका ढीली नृत्य : यह मंदालय के साथ कुल्लू में प्रचलित नृत्य है। कुल्लू में यह नाटी बहुत प्रसिद्ध है।
10. लालहडी नृत्य: यह भी कुल्लू में प्रचलित है। नर्तक दल बारी-बारी से इसे करते हैं और लोकगीतों को तुकबन्दियों के रूप गाते हैं।
11. पंगवाल नृत्य: चम्बा घाटी के पंगवाल क्षेत्र में पंगवाल समुदाय द्वारा यह नृत्य किया जाता है। पुरूष इसे दिन में और स्त्रियां सांझ ढलने पर करती हैं।

12. सेन नृत्य: भूत-प्रतों को भगाने के लिए पांगी घाटी में यह नृत्य किया जाता है।

मुखौटे पहनकर छम्म नृत्य करते नर्तक

                                     मुखौटे पहनकर छम्म नृत्य करते नर्तक

13. राक्षस नृत्य, छम्म:

राक्षस नृत्य मुखौटे पहनकर नाचा जाता है। ये मुखौटे तीन, पांच, सात और नौ की संख्या में होते हैं। इस क्षेत्र में दुरात्माओं तथा राक्षसों से फसलों की रक्षा के लिए लामा लोग यह नृत्य करते हैं। यह भंगड़े जैसा दिखता है। आदिम वेशभूषा और आभूषणों से सजे नर्तक भयंकर लगते हैं। इस नृत्य में भूत-प्रेतों तथा राक्षसों को भगाने के दृश्य प्रस्तुत किए जाते हैं। चैत्रोल, वीशू और दीवाली के अवसर पर इन नृत्यों का आयोजन होता है। स्त्री-पुरूष एक दूसरे का हाथ पकडक़र नाचते हैं। सबसे आगे नाचने वाले को घुरे कहा जाता है। कहीं-कहीं स्त्री-पुरूष अलग-अलग भी नाचते हैं।

14. डलशोन तथा चोल्लंबा नृत्य:

डलशोन नृत्य तथा अन्य बहुत से नृत्य रोपा घाटी के हैं। डलशोन में सांच के कुंडल जैसा नृत्य किया जाता है। चोल्लंबा नृत्य बाघ के मरने पर नाटी में लगाया जाता है। इसमें बाघ की खाल में भूसा भरकर उसकी नाक में सोने का आभूषण डालकर नृत्य कराया जाता है। नागस कायड़ नृत्य में नर्तक सांच की तरह टेढ़ी-मेढ़ी पंक्तियों में नाचते हैं। हेरकी कायड़ तेज गति का प्रेम गीत के साथ किया जाने वाला नृत्य है जिसे युवा लोग ही तीव्रता से कर पाते हैं। शुना कायड़ नृत्य सभी गांवों में होता है। नर्तक कभी दौड़ते, कभी मंद गति से नाचते हैं।
जातरू कामड़ नृत्य: त्यौहारों के अवसर पर बड़े जनसमूह द्वारा यह नृत्य किए जाते हैं जिसमें नाचने वालों की संख्या सैंकड़ों में पहुंच जाती है। इसमें वादक वाद्य-यंत्र बजते हैं और धुरे चमर लेकर मस्ती में नाचता है।

14. शन् तथा शाबू नृत्य:

शन् से अभिप्राय बुद्ध स्तुति गीत से है। लाहौल घाटी का यह लोकप्रिय नाच है। बुद्ध की स्तुतियों पर आधारित यह जातीय नृत्य फसलों की कटाई पर किया जाता है। इसमें शहनाई, ढोल तथा वायलन की तरह का तार वाद्य प्रयुक्त होता है। शाबू नृत्य, त्यौहारों के अवसर पर किया जाता है। लाहौल में नृत्य प्राय: मंदिरों के प्रांगन में किए जाते हैं। थर-कायड़, नागस कायड़, छेरकी कायड़, शुना कायड़, वाकायड़  आदि नृत्यों में बाघ आदि पशुओं तथा नागिन की मुद्राएं बनाकर नाचा जाता है। जनजातीय विश्वास और जीवन-शैली इसमें झलकती है।

15. नाटी नृत्य :

कुल्लू, मण्डी, महासू, चम्बा आदि क्षेत्रों में नाटी नृत्य अनेक रूपों में प्रचलित है। कुल्लू में ऐतिहासिक दृष्टि से इसे सिराजी नाटी कहते हैं क्योंकि इसमें गीत कुल्लू से तथा सुर-ताल भीतरी सिराज से लिए गए हैं। कत्थक नृत्य की तरह इसकी अनेक विधाएं तथा नाम हैं। इनमें ढोली, देसी, फेटी, बाखली, काहिका, दोहरी, लाहौली, चंबियाली, बांठडा, तथा लुटी आदि नाटियां प्रसिद्ध हैं। इसमें ढोल, नगाड़ा, शहनाई, करताल तथा रणसिंगा आदि वाद्यों का प्रयोग होता है। हेसी जाति के लोग मधुर शहनाई बजाते हैं जो नृत्य की जान है। यह विलम्बित गति का, एकदम लास्य नृत्य है। इसमें बच्चे, बूढ़े, अमीर-गरीब एक कतार में जुडक़र नाचते हैं। रंग-बिरंगी स्थानीय पोषाकों और आभूषणों से सजे नर्तक नाचते हुए आकर्षक लगते हैं। नाचते समय स्त्री-पुरूष एक हाथ में सुसज्जित पंखा और दूसरे में रूमाल लिए रहते हैं। इसमें पाद-प्रक्षेप, अंग-चेष्टा आदि के संकेत रूप में तालियों का प्रयोग किया जाता है।

ऊपरी शिमला में पहाड़ी लोकनृत्य करती महिलाएं व पुरुष

         ऊपरी शिमला में पहाड़ी लोकनृत्य करती महिलाएं व पुरुष

16. झूरी, गी, रासा नृत्य :

सिरमौर तथा उसके आस-पास के लोकप्रिय नाट्य रूपों में झूरी, ठडईर, रासा, गी, नाटी, स्वांगटेगी, धरवेणी, द्रोडी व पडुआ सिरमौर तथा आसपास के क्षेत्रों के लोकप्रिय नृत्यरूप हैं। झूरी खुले वातावरण में ताल के साथ गाई तथा नाची जाती है। इसे गी की भांति प्रश्रोतर रूप में भी गाया व नाचा जाता है। इसमें बांहें फैलाकर चक्कर मारना जरूरी होता है। ठडईर रौद्र ताल पर नाचा जाता है। इसमें नर्तक एक हाथ में गंडासा, डंडा, तीर-कमान लेकर नाचते हैं, परस्पर ललकारते, नाचते, झूमते शत्रु की ओर बढ़ते हैं। इस नृत्य में ऐतिहासिक कथाओं को अभिनीत किया जाता है। रासा नृत्य एकता का प्रतीक है। इसमें नर्तक लम्बी कतार में कदमों को आगे-पीछे ताल के अनुसार रखकर नाचते हैं। वे कभी झूमते हैं, कभी मुड़ते तथा बैठते हैं।

17.स्वांगटेगी नृत्य :

कुल्लू के दशहरे में अनेक नृत्य देखने को मिलते हैं। स्वांगटेगी नृत्य, शेर तथा बाघ के काठ के मुखौटे पहनकर किया जाता है। यह जंगली जानवरों जैसा स्वछंद नृत्य है। धरवेणी तथा द्रोड़ी,  देवनृत्य हैं। जागर, शांत आदि अवसरों पर ऐसे नृत्य आयोजित किए जाते हैं। इन नृत्यों में युद्धरत वीरों, आक्रमणकारयिों, मंदिरों, स्तूपों आदि के दृश्य भी प्रस्तुत किए जाते हैं। गोलकार हाथ थामे नाचना, नाचते-नाचते भूमि पर लेट जाना, हाथ-पांव उठा-उठाकर विभिन्न प्रकार की भंगिमाएं बनाना, ऐसे नृत्यों के विशेष आकर्षण हैं।

18.खड़ायत तथा लांबर नृत्य:

खड़ायत नृत्य में नर्तक एक हाथ में तलवार तथा दूसरे में म्यान लेकर वृत्ताकर नाचते हैं। लय और तलवार तथा दूसरे म्यान लेकर वृत्ताकार नाचते हैं। लय और ताल में मस्त नतृकों द्वारा तलवारबाजी के करतब दिखाए जाते हैं। इनमें ताल और पद संचालन की अपेक्षा तलवार के करतब दिखाने पर बल रहता है। तलवार वाले नृतक दो-दो का जोड़ा बनाकर  तीव्र गति से नाच करते हैं। इस नाच द्वारा क्षेत्रीय राजाओं की वीरता की कहानियां कही जाती हैं।
लांबर नृत्य में पद संचालद का अधिक महत्व रहता है। इसमें नर्तक सबसे पहले दाईं टांग से एक कदम आगे लेते हें फिर बांया-दांया  तीन कदम लगाकर पीछे को जाते हैं और चौथा कदम अन्य कदमों से लंबा कर पहले वाली अवस्था में आ जाते हैं। कदमों की गति के साथ दोनों हाथों से ताली बजायी जाती है।

19.लालड़ी तथा घूघती नृत्य:

पहाड़ों में स्त्री की स्थिति और समाज में स्थान मैदानों से बेहतर है। पहाड़ी स्वतंत्र समाजों में स्त्री-नृत्यों की परंपरा भी मिलती है। लालड़ीलोकप्रिय स्त्री-नृत्य है। इसमें स्त्रियां दो दलों में बंटकर एक-दूसरे के सामने पंक्तियों में खड़ी हो जाती हैं। एक दल की स्त्रियों के द्वारा गीत आरंभ किया जाता है और दूसरे दल की स्त्रियां कमर झुकाकर दोनों हाथों से ताली बजाती है, गीत की पंक्ति पूरी होने तक आगे बढ़ती रहती हैं। इस अवधि में दूसरे दल की स्त्रियां पीछे हटती जाती हैं। गीत की पंक्ति पूरी होने पर पहले दल की स्त्रियां खड़ी हो जाती हैं और दूसरे दल की स्त्रियां उसी प्रकार कमर झुकाए, ताली बजाती, गीत-गाती आगे बढ़ती हैं। यह क्रम देर तक चलता है। ढोल, नगाड़ा तथा शहनाई जैसे वाद्य प्रयोग होते हैं। ताल तथा लय आदि ताली बजाकर ही पूरे किए जाते हैं। घूघती नृत्य में नर्तक अपना हाथ अगले नर्तक अपना हाथ अगले नर्तक के कंधों पर रखता है। अगले तीन-चार नर्तक घूघती गीत को गाते हैं और शेष उसे दोराहते हैं। इस नृत्य में शारीरिक गति महत्वपूर्ण रहती है। इसमें नर्तक नाचते-नाचते, आगे-पीछे को झुकते हैं और कभी दाएं-बाएं को।

20.डंडारस तथा डंगी नृत्य:

ढोल पर बजते धमाल, लाहौली आदि तालों पर मंद तथा तीव्र गति से जब यह नाच  होता है तो दृश्य देखने काबिल होता है। लाहौली ताल,  मंद गति से चलता है। डंगी  इस क्षेत्र का स्त्री नृत्य नाचा जाता है। इसमें गद्दने खड़ी पंक्तियों तथा वृत्ताकार नाचती हैं। सुन्ही-भूंखू के प्रणय-गीत को बड़ी मंद तथा मधुर गति से गाया जाता है। यह नृत्य अपने लालित्य और लावण्य के लिए प्रसिद्ध है।
कीकली तथा भंगड़ा नृत्य: पंजाब से लगते क्षेत्रों में कीकली डालने की पंरपरा रही है। यह अवयस्क लड़कियों का नृत्य और खेल है। इसमें लड़कियां दो-दो का जोड़ा गोलाकार चक्कर लगाती हैं। इसके साथ-साथ वे गीत भी गाती है जो मनोरंजक होते हैं। हिमाचल के कुछ भगों में भंगडा भी पुरुषों द्वारा डाला जाता है। मूलत: यह पंजाब का नृत्य है। हिमाचल के पुर्नगठन से पूर्व 1948 तक हिमाचल का एक बड़ा हिस्सा पंजाब की पहाड़ी रियासतों के रूप में जाना जाता था। यह उसी का प्रभाव है।

21.ठोडा नृत्य :

दुनिया में तीरंदाजी की कितनी ही शैलियां हैं मगर हिमाचल व उत्तराखंड की पर्वतावलियों के बाशिंदों की यह तीरकमानी अद्भुत व निराली है। माना जाता है कि कौरवों व पांडवों की यादें इन पर्वतीय क्षेत्रों में अभी तक रची-बसी हैं। ठोडा योद्धाओं में एक दल पाशी (पाश्ड, पाठा, पाठडे) यानी पांच पांडवों का है और दूसरा शाठी (शाठड, शाठा, शठडे) यानी कौरवों का। जनश्रुतियों के अनुसार कौरव साठ थे सो शाठड (साठ) कहे जाते हैं। कभी कबीलों में रह चुके यह दल अपने को कौरवों व पांडवों के समर्थन में लडे योद्धाओं का वशंज मानते हैं।

खेल, नृत्य व नाट्य का सम्मिश्रण ठोडा

                      खेल, नृत्य व नाट्य का सम्मिश्रण ठोडा

इसके लिए धनुर्धारी कमर से नीचे मोटे कपडे, बोरी या ऊन का घेरेदार वस्त्र लपेटते हैं या फिर चूडीदार वस्त्र (सूथन) पहनते हैं। मोटे-मोटे बूट, कहीं-कहीं भैंस के चमडे से बनाए गए घुटनों तक के जूते साधारण कमीज व जैकेट धारण होता है। पहाडी संस्कृति के विद्वान बताते हैं कि ठोडा का धणु (धनुष) डेढ से दो मीटर लंबा होता है और चांबा नामक एक विशेष लकडी से बनाया जाता है। शरी (तीर) धनुष के अनुपात में एक से डेढ मीटर का होता है और स्थानीय बांस की बीच से खोखली लकडी नरगली या फिरल का बनाया जाता है, जिसके एक तरफ खुले मुंह में अनुमानत दस बारह सेंटीमीटर की लकडी का एक टुकडा फिक्स किया जाता है जो एक तरफ से चपटा व दूसरी तरफ से पतला व तीखा होता है और नरगली के छेद से गुजारा जाता है। चपटा जानबूझ कर रखा जाता है ताकि प्रतिद्वंद्वी की टांग पर प्रहार के समय लगने पर ज्यादा चोट न पहुंचे।

दिलचस्प यह है कि इस लकडी को ही ठोडा कहते हैं। इस खेल युद्ध में घुटने से नीचे तीर सफलता से लगने पर खिलाडी को विशेष अंक दिए जाते हैं। वहीं घुटने से ऊपर वार न करने का सख्त नियम है। जो करता है उसे फाउल करार दिया जाता है। ठोडा में अपने चुने हुए प्रतिद्वंद्वी की पिंडली पर निशाना साधा जाता है, दूसरे प्रतिद्वंद्वी पर नहीं। जिस व्यक्ति पर वार किया जाता है वह हाथ में डांगरा लिए नृत्य करते हुए वार को बेकार करने का प्रयास करता है। बच जाता है तो वह प्रतिद्वंद्वी का मजाक उडाता है, मसखरी करता है। इस तरह खेल-खेल में मनोरंजन हो जाता है और ठोडा खेलने वालों का जोश भी बरकरार रहता है। फिर दूसरा खिलाडी निशाना साधता है। लगातार जोश का माहौल बनाने वाले लोक संगीत के साथ-साथ खेल यूं ही आगे बढता रहता है। कई बार खेलने वाले जख्मी हो जाते हैं मगर ठोडा के मैदान में कोई पीठ नहीं दिखाता। खेल की समयावधि सूर्य डूबने तक निश्चित होती है। शाम उतरती है तो थकावट चढती है और रात मनोरंजन चाहती है। स्वादिष्ट स्थानीय खाद्यों के साथ मांस, शराब पेश की जाती है और नाच-गाना होता है। अगले दिन फिर ठोडा आयोजित किया जाता है।

पाशी और शाठी दोनों की परंपरागत खुन्नस शाश्वत मानी जाती है मगर खुशी गम और जरूरत के मौसम में वे मिलते-जुलते हैं और एक दूसरे के काम आते हैं। उनमें आपस में रिश्तेदारियां भी हैं। जब बिशु (बैसाख का पहला दिन) आता है तो पुरानी नफरत थोडी सी जवान होती है, गांव-गांव में युद्ध की तैयारियां शुरू हो जाती हैं जिसे किसी वर्ष शाठी आयोजित करते हैं तो कभी पाशी। कबीले का मुखिया बिशु आयोजन के दिन प्रात: कुलदेवता की पूजा करता है और अपने सहयोगियों के साथ ठोडा खेलने आ रहे लोगों के आतिथ्य और अपनी जीत के लिए मंत्रणा करता है।

युद्ध प्रशिक्षण का अवशेष माने जाने वाले ठोडा में खेल, नृत्य व नाट्य का सम्मिश्रण है। धनुष बाजी का खेल, वाद्यों की झंकार में नृत्यमय हो उठता हैं। खिलाडी व नाट्य वीर रस में डूबे इसलिए होते हैं क्योंकि यह महाभारत के महायुद्ध से प्रेरित है। भारतीय संस्कृति के मातम के मौसम में पहाड वासियों ने लुप्त हो रही सांस्कृतिक परंपरा को जैसे-तैसे करके जीवित रखा है। कौशल, व्यायाम व मनोरंजन के पर्याय ठोडा को हमारी लोक संस्कृति के कितने ही उत्सवों में जगह मिलती है जहां पर्यटक भी होते हैं और स्थानीय लोग भी। ठोडा आम तौर पर हर साल बैसाखी के दो दिनों- 13 व 14 अप्रैल को होता है। शिमला जिले के ठियोग डिवीजन, नारकंडा ब्लॉक, चौपाल डिवीजन, सिरमौर व सोलन में कहीं भी इसका आनंद लिया जा सकता है।

कांगड़ा, हमीरपुर तथा ऊना में भांगड़ा लोकप्रिय है।

22.गद्दी लोक नृत्य:

चंबा के गद्दी युवक और वृद्ध यह नृत्य करते हैं और गद्दने नृत्य गीत गाती हैं।
23.घुरेई नृत्य: यह चंबा का पारम्पारिक नृत्य है जोकि विवाहादि खुशियों, मेलों और भगवती की जातराओं के समय किया जाता है। केवल स्त्रियां ही इसमें नाचती हैं। गीतों में नारी-सौदंर्य का वर्णन रहता है।
24.भूद्दने नृत्य: यह लोकनृत्य लाहौल स्पीति की पिन घाटी का प्रमुख लोकनृत्य है। इसमें याक नृत्य, सिंह नृत्य तथा बंदर नृत्य का प्रचलन है।
शेर नृत्य: किन्नौर तथा लाहौल स्पीति के लामा लोग भूत-प्रेतों एवं दुरात्माओं को भगाने के लिए यह नृत्य करते हैं आदिवासी भिक्षुओं में अधिक लोकप्रिय है।
कायड नृत्य: लाहौल स्पीति के राजा युकुन्तरस के विवाह पर यह नृत्य पहली बार किया गया था। इसके लिए भी अनेक रूप प्रचलित हैं।
इस लोक नृत्य में युवक श्वेत चोलू या श्वेत कुर्ता-पायजामा व पगड़ी पहनते हैं। इसी प्रकार युवतियां रंगबिरंगे बड़े घेरेदार चोलू व पारम्परिक आभूषण धारण कर गोल-गोल घूम कर समूह नृत्य करते हैं। आरम्भ में लुड्डी नृत्य धीमी गति से प्रारंभ होकर धीरे-धीरे गति पकड़ता जाता है। नर्तक अपने आकर्षक हाव-भाव व पैरों को गति प्रदान करते हुए लोकवाद्यों व लोक गीतों के माध्यम से संगीत के साथ एकाकार हो जाते हैं। यह बहुत ही आकर्षक नृत्य है।
नाटी नृत्य: नाटी नृत्य हिमाचल प्रदेश में प्रचलित कुल्लू, सिरमौर, मण्डी उपरी क्षेत्र किन्नौर, शिमला इत्यादि जनपदों में किया जाता है। इसे धीमी गति से आरम्भ किया जाता है, जिसे करते समय इसे ढीली नाटी कहा जाता है, बाद में यह द्रुत गति से बढ़ता जाता है जिसमें ढोलक, करनाल, रणसिंघा, बांसुरी, शहनाई एवं नगाड़े का प्रयोग किया जाता है।
घुरई नृत्य: यह नृत्य चम्बा क्षेत्र में किया जाता है। घुरई का अर्थ है गोल -गोल घूमना। अपने परम्परिक वस्त्रों में स्त्रियाँ इस नृत्य को करती हैं। गले में कंठहार, पैरों में पाजेब, नाक में बेसर, कानों में कर्णफूल धारण करती हैं। इसमें ऐतिहासिक घटना का वर्णन होता है। इस नृत्य को स्त्रियों द्वारा किया जाता है।
गददी नृत्य (डंडारस): यह नृत्य चम्बा के गददी जनजातीय लोगों के द्वारा किया जाता है। पुरुष उनका चोला पहनते हैं। कमर में काला डोरा, सिर पर साफा और कलगी धारण करते हैं तथा स्त्रियां बहुत से आभूषण धारण करती हैं।
पंगवाली नृत्य: पांगी के लोग पर्व व उत्सवों पर अपने पारंपरिक वस्त्रों तथा आभूषणों को धारण कर पंगवाली नृत्य करते हैं।
झमाकड़ा नृत्य: झमाकड़ा नृत्य कांगड़ा क्षेत्र में किया जाने वाला नृत्य है। इस नृत्य का प्रचलन जिस समय बारात वधू के द्वार पर आ पहुंचती है, उस समय ग्राम्य वधुएं नए वस्त्र धारण कर बारात की आगवानी करती हैं, उन्हें मीठी-मीठी गाली गलौज भी करती हैं। हास्य-व्यंग्य द्वारा बारातियों को संबोधित किया जाता है। झमाकड़ा नृत्य करते समय पारंपरिक पहनावे में घाघरी कुर्त्ता धारण किया जाता है। सिर पर चांदी का चाक, गले में कंठहार तथा चन्द्रहार, नाक में नथनी, पैरों में पाजेब धारण करती हैं। इस नृत्य में ढोलक, बांसुरी, खंजरी का प्रयोग होता है।
गिद्धा नृत्य(पडुआ):

यह नृत्य सोलन जनपद, बिलासपुर तथा मण्डी के कई स्थानों पर प्रचलित है। पंजाब में भी गिद्धा होता है परन्तु यहां का गिद्धा पंजाब से बहुत भिन्न है। यह नृत्य अद्र्धचंद्राकार स्थिति में किया जाता है। यह नृत्य विवाह परंपरा से जुड़ा है। जब बारात वधु के घर जाती है तो उसके पश्चात् घर की स्त्रियां घर पर यह मंगल नृत्य करती हैं। उसके साजन की प्रशंसा, जेठानी तथा सास के किस्सों से व सौत की डाह में गाए जाने वाले गीतों से जुड़ा है।

लुड्डी लोक नृत्य:

लुड्डी नृत्य मण्डी जनपद में विशेष उत्सवों, मेलों व त्योंहारों के अवसर पर किया जाने वाला लोकनृत्य है। राजाओं के शासन काल में स्त्रियों में पर्दा प्रथा होने के कारण लुड्डी नृत्य में नवयुवकों को स्त्रियों के परिधान पहना कर व उनका सम्पूर्ण श्रृंगार कर इस नृत्य का मंचन करवाया जाता था। धीरे-धीरे समय अनुसार जो बदलाव आये तथा स्त्रियों की पर्दा प्रथा समाप्त होने पर यह लोक नृत्य युवक व युवतियों द्वारा किया जाने लगा है।
ऊना जिले में भी गिद्धा नृत्य की परंपरा है जो पंजाब के गिद्धा से बहुत मिलता है। हमीरपुर जिले में झमाकड़ा व पडुआ नृत्य का प्रचलन है। इसके अतिरिक्त हमीरपुर में लोक संगीत की अन्य विधाएं हैं जिनमें कि टमक वाद्य को प्रमुख अधिमान दिया जाता है। यहां भजन व तुम्बा वाद्य लोकप्रिय है। गुग्गा गाथा का भी प्रचलन है। इसके अतिरिक्त धाजा लोकनाट्य, चरकटी, नौपत आदि प्रमुख हैं।
सिंघी छम (सिंह नृत्य), प्रेत नृत्य:

हिमाचल प्रदेश का लाहौल जनपद तिब्बत की सीमाओं से लगा है जिसमे बौद्ध संस्कृति का विशेष प्रभाव है। सिंह नृत्य में लामा लोग सिंह का वेश धारण कर पारंपरिक लोक वाद्यों की ताल पर नृत्य करते हैं। इसमें यह धारणा है कि विकट रूप धारण करने से दुष्ट आत्माएं तंग नहीं करती हैं। इसमें बजने वाले वाद्य यंत्र ढोल,बुगजाल,बांसुरी है।  प्रेतों को भगाने के लिए बौद्ध लामाओं द्वारा तांन्त्रिक नृत्य किया जाता है। इसके अनेक रूप प्रचालित हैं।
मुखौटा नृत्य: यह नृत्य जनजातीय क्षेत्र किन्नौर तथा लाहौल-स्पिति में किया जाता है। इस नृत्य में देवताओं तथा पशुओं के मुखौटे पहन कर स्थानीय ताल पर पौराणिक एवं पारंपरिक सन्दर्भों का प्रयोग कर उन्हें नृत्य शैली में प्रस्तुत करते हैं।

 प्रदेश में हर जनपद के अलग-अलग नृत्य हैं। बिलासपुर में फूला चंदेल घट नृत्य करती हैं। शिमला क्षेत्र में दीपक नृत्य, सिरमौर में परात नृत्य, किन्नौर का क्यांग, चंबा में गद्दी नृत्य, कुल्लू में नाटी तथा शिमला में सामूहिक नृत्य नाटी प्रचलित है। मंडी का पारंपरिक नृत्य लुडी है। बौद्धमठों में लोसर व छिसु मेले के दौरान मुखौटा नृत्य व छमम नृत्य गोंपा प्रागण में होता है। रामपुर क्षेत्र में ताबो तथा आउटर सिराज में मेले के दौरान घंटों नाटी नृत्य चलता है जिसमें नारी न पुरुष भाग लेते हैं। महाविद्यालयों में हर साल लोक नृत्य मुकाबले राज्य स्तर पर होते हैं। प्रदेश में लोक नृत्य की प्रसिद्ध परंपरा है। इन नृत्यों में नर्तक विशेष परिधान पहनते हैं। इस सांस्कृतिक विरासत को सरंक्षण की जरूरत है।”

One Comment

  1. neha singh
    Apr 16, 2016 at 11:55 pm

    Sir please history ka aur bhi matter daal dijiye aapke notes bahaut useful hote hai

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