न्यायिक सक्रियता : दुष्परिणाम

उच्चतम न्यायालय को अपनी ही सक्रियता के दुष्परिणाम को रोकने के लिए अपने आदेश को स्थगित करना पड़ा है। इसी 16 दिसंबर को उच्चतम न्यायालय ने उत्तर प्रदेश सरकार को पूर्व न्यायमूर्ति वीरेंद्र सिंह यादव को लोकायुक्त नियुक्त करने का निर्देश दिया और इसके अनुपालन के लिए 20 दिसंबर की समयसीमा भी निर्धारित कर दी। यह न्यायिक सक्रियता का एक अभूतपूर्व उदाहरण था जब उच्चतम न्यायालय ने सीधे-सीधे किसी वरिष्ठ पदाधिकारी की स्वयं नियुक्ति कर दी। यह एक नई परंपरा की शुरुआत भी थी। इसके पीछे तर्क यह था कि संवैधानिक अधिकारी अपना काम नहीं कर पा रहे हैं। इस मामले में संवैधानिक अधिकारी हैं-उप्र के मुख्यमंत्री, राज्यपाल एवं इलाहाबाद उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश। इन तीनों की समिति लोकायुक्त का चयन करती है।

खुद लोकायुक्त की नियुक्ति कर उच्चतम न्यायालय ने वही किया जो राज्य सरकार चाहती थी। सरकार वीरेंद्र सिंह को लोकायुक्त बनाना चाहती थी, किंतु उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति चंद्रचूड के विरोध के कारण नहीं कर पा रही थी। सर्वोच्च अदालत के निर्देश के बाद न्यायमूर्ति चंद्रचूड ने कड़ा विरोध करते हुए खुलासा किया कि मुख्यमंत्री तो वीरेंद्र सिंह के नाम को वापस लेने को तैयार हो गए थे, किंतु आश्चर्यजनक रूप से नामों की जो सूची उच्चतम न्यायालय को भेजी गई उसमें उनका नाम शामिल किया गया। शीर्ष अदालत को यह भी बताया गया था कि वीरेंद्र सिंह के नाम पर समिति के सभी सदस्यों की सहमति है। स्पष्ट है कि शीर्ष अदालत को गुमराह करने का प्रयास किया गया। इसके लिए न्यायालय को दोषी व्यक्तियों को दंडित करना चाहिए।

लोकायुक्त के चयन के लिए समिति की छह बैठकें हुईं, किंतु किसी में उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को नहीं बुलाया गया। इस कारण राज्यपाल ने राज्य सरकार की अनुशंसा मानने से इंकार कर दिया। उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को लोकायुक्त चयन की प्रक्रिया से किनारे करने के लिए राज्य सरकार ने लोकायुक्त कानून में बदलाव कर समिति से मुख्य न्यायाधीश को ही हटा दिया। इसके लिए अध्यादेश लाया गया, जिस पर राज्यपाल ने सहमति देने से इंकार कर दिया। फिर विधानमंडल में संशोधन विधेयक पारित कराया गया, परंतु राज्यपाल ने उस पर हस्ताक्षर करने से मना कर दिया।

इलाहाबाद उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की आपत्ति सार्वजनिक होने के बाद एक जनहित याचिका दायर हुई जिस पर उच्चतम न्यायालय ने 19 दिसंबर को विशेष सुनवाई कर वीरेंद्र सिंह को शपथ दिलाने से रोकने का निर्देश दिया। सवाल उठता है कि सर्वोच्च न्यायालय ने किसी को लोकायुक्त बनाने का निर्देश क्यों दिया जबकि नियुक्ति का अधिकार सरकार के पास है? अगर सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों का उल्लंघन हो रहा था तो उसे संबद्ध व्यक्तियों के विरुद्ध अवमानना की कार्यवाही शुरू करनी चाहिए थी, परंतु न्यायालय ने संविधान के अनुच्छेद 142 का हवाला दिया जिसमें सर्वोच्च अदालत को ‘पूर्ण न्याय’ करने की शक्ति दी गई है।

 

संबंधित अनुच्छेद में स्पष्ट है कि उच्चतम न्यायालय ‘अपने अधिकार क्षेत्र के इस्तेमाल में’ ही ऐसा कोई आदेश पारित कर सकता है। भारत सरकार अधिनियम, 1935 के अंतर्गत संघीय कोर्ट केवल व्यवस्था दे सकती थी, किंतु उसे लागू कराना उसके अधिकार क्षेत्र में नहीं था। इस अनुच्छेद ने उस लाचारी को खत्म कर दिया, परंतु सर्वोच्च अदालत इसकी व्याख्या अपनी सुविधानुसार करती रही है। केएम नानावती बनाम बंबई मामले (1961) में उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया कि अनुच्छेद 142 के तहत प्रदत्त शक्तियां असीमित हैं, परंतु प्रेमचंद गर्ग बनाम एक्साइज कमिश्नर (1963) मामले में पांच जजों की एक संविधान पीठ ने यह साफ कर दिया कि किसी कानून की अनदेखी कर न्यायालय कोई निर्णय नहीं दे सकता है।

यानी जहां कानून स्पष्ट है वहां अनुच्छेद 142 का सहारा लेकर कोई और निर्णय नहीं दिया जा सकता। 1988 में एआर अंतुले बनाम आरएस नायक में सात न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने गर्ग मामले में दी गई व्यवस्था की पुष्टि की। इसके बावजूद दिल्ली जुडिशियल सर्विस बनाम गुजरात (1991) मामले में न्यायालय ने निर्णय दिया कि किसी कानून से उसकी शक्ति सीमित नहीं होती है।

यूनियन कार्बाइड कार्पोरेशन बनाम संघ (1991) मामले में न्यायालय ने इसके तहत प्राप्त शक्ति का सहारा लेकर यूसीसी बनाम भारत सरकार के बीच हुए समझौते को उचित ठहराते हुए सभी लंबित दीवानी एवं फौजदारी मामलों को खत्म कर दिया। फिर लक्ष्मीदास मोरारजी (2009) मामले में न्यायालय ने कहा कि अनुच्छेद 142 के अंतर्गत दी गई शक्तियों का इस्तेमाल कभी-कभार किया जाना चाहिए। अब स्थिति यह है तलाक के मामलों भी इसका इस्तेमाल हो रहा है।

इसका उल्लेख कर उच्चतम न्यायालय ने अनीता सभरवाल बनाम अनिल सभरवाल में कानून द्वारा निर्धारित छह माह की अवधि पूरी होने के पहले ही तलाक की अनुमति दे दी। अनिल जैन बनाम माया जैन मामले में अंतिम रूप से शादी टूटने को आधार मानते हुए तलाक की अनुमति दे दी जबकि कानून में ऐसा नहीं है। उच्चतम न्यायायल ने यह भी स्पष्ट किया कि वह तो ऐसा कर सकता है, क्योंकि उसे अनुच्छेद 142 के अंतर्गत शक्ति प्राप्त है किंतु उच्च न्यायालय ऐसा नहीं कर सकता। 

 

अनुच्छेद 142 का बार-बार इस्तेमाल गलत है। इसके बावजूद कई बार अदालत सीमा रेखा का अतिक्रमण करती है। अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति फ्रैंक फर्टर ने ट्रोप बनाम डलेस (1958) मामले में टिप्पणी की थी ‘सत्ता अतिक्रमणकारी प्रवृत्ति की होती हैं। न्यायिक सत्ता इस मानवीय कमजोरी से मुक्त नहीं है। इसे अपनी सीमा के बाहर जाकर अतिक्रमण करने के प्रति सचेत रहना चाहिए, क्योंकि इसके ऊपर एक ही संयम है, वह है आत्मसंयम।’

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