प्रधानमंत्री ग्रामीण आवास योजना : बेघर लोगो के लिए कल्याणकारी योजना

images (1)यह स्वागतयोग्य है कि केंद्र की मोदी सरकार ने देश के सभी बेघरों को प्रधानमंत्री ग्रामीण आवास योजना के तहत वर्ष 2022 तक पक्का आवास उपलब्ध कराने का फैसला किया है.

आजादी के साढ़े छह दशक बाद भी देश में करोड़ों लोग ऐसे हैं, जो सुविधाहीन झुग्गी-झोपड़ियों में जीवन गुजारने को विवश हैं. 2011 की जनगणना के अनुसार ग्रामीण इलाकों में बेघरों की संख्या तीन करोड़ के आसपास है.

सरकार की ओर से इस योजना के तहत ग्रामीण क्षेत्र के लोगों को मकान बनाने के लिए एक लाख बीस हजार और पर्वतीय व सुदूर क्षेत्रों के लिए एक लाख तीस हजार रुपए उपलब्ध कराने की योजना है. योजना पर तकरीबन 81,975 करोड़ रुपए खर्च होंगे. इसमें से 60 हजार करोड़ रुपए बजट प्रावधान के जरिए और शेष 21,975 करोड़ नाबार्ड निधि से खर्च होंगे. वैसे तो योजना का लक्ष्य अगले पांच साल में सभी बेघरों को आवास उपलब्ध कराने का है लेकिन सरकार द्वारा 2016 से 2019 के बीच तकरीबन एक करोड़ लोगों को आवास उपलब्ध कराने का लक्ष्य रखा गया है. गौरतलब है कि सरकार शहरी क्षेत्रों के बेघरों के लिए पहले ही योजना लागू कर चुकी है. इसके तहत 4000 से अधिक छोटे-बड़े शहरों में दो करोड़ मकान बनाए जाएंगे. अगर यह योजना आकार लेती है तो निस्संदेह ग्रामीण व शहरी गरीबों के पास अपना घर होगा. साथ ही, गांवों और शहरों का हुलिया बदलेगा.

नेशनल सैंपल सव्रे आर्गनाइजेशन (एनएसएसओ) की रिपोर्ट  पर विश्वास करें तो आबादी का आठवां हिस्सा बेघर है. आंकड़े बताते हैं कि 12 राज्यों में 33 हजार से अधिक झुग्गी-बस्तियां हैं. अकेले महाराष्ट्र में ही 23 फीसदी लोग झुग्गियों में रहते हैं. कुछ ऐसा ही हाल आंध्र प्रदेश, प. बंगाल, दिल्ली और कर्नाटक जैसे राज्यों का भी है. गत वर्ष पहले योजना आयोग के मुख्य सलाहकार प्रणव सेन की अध्यक्षता वाली समिति ने कहा कि वर्ष 2011 में शहरों में झुग्गी-बस्तियों में रहने वाले लोगों की आबादी 9 करोड़ से अधिक होगी. उनकी भविष्यवाणी सच साबित हुई. आज 15 करोड़ से अधिक आबादी झुग्गी-बस्तियों में रह रही है. संयुक्त राष्ट्र समर्थित एक रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2031 तक देश की शहरी आबादी 60 करोड़ होने का अनुमान है.

Pradhan-Mantri-Awas-Yojana-by-2022-622x250अर्थव्यवस्था और वातावरण पर केंद्रित वैश्विक आयोग की नई रिपोर्ट के मुताबिक पिछले दो दशकों में भारत की शहरी आबादी 21 करोड़ 70 लाख बढ़कर 37 करोड़ 70 लाख हो चुकी है, जो 2031 तक 60 करोड़ हो जाएगी. यानी 40 फीसद आबादी शहरी होगी. रिपोर्ट में कहा गया है कि शहरों के किनारे पर बस रहे नए शहरों की बसावट में कोई योजना नहीं है. इनके निर्माण में मानकों और कानूनों का ध्यान नहीं रखा जा रहा. नए शहर अनियंत्रित विकास को बढ़ावा दे रहे हैं.

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि नए शहरों के विकास के लिए अगले बीस साल में करीब पांच लाख करोड़ रुपए की जरूरत पड़ेगी. इसका दो तिहाई केवल शहरी सड़कों और यातायात पर खर्च होगा. रिपोर्ट में आशंका जाहिर की गई है कि तेज गति से बढ़ रही शहरी आबादी को नियंत्रित नहीं किया गया तो 2050 तक शहरी वायु प्रदूषण से अकाल मौतों में वृद्धि होगी. अच्छी बात है कि केंद्र सरकार ग्रामीण व शहरी बेघरों को आवास उपलब्ध करा रही है. लेकिन यह नियोजित तरीके से होना चाहिए. ध्यान रखना होगा कि एक बड़ी आबादी हर वर्ष रोजी-रोजगार के लिए शहरों की ओर रुख कर रही है. उचित होगा कि इस समस्या से निपटने के लिए केंद्र व राज्य सरकारें मिलकर दीर्घकालीन रणनीति तैयार करें. इसके लिए सबसे जरूरी ग्रामीण क्षेत्रों से पलायन रोकना है.

लेकिन यह तभी संभव होगा जब गांवों में रोजगार के अवसर उपलब्ध होंगे. किंतु आश्चर्य कि इस दिशा में कुछ ठोस पहल होती नहीं दिख रही. केंद्र सरकार ने गांवों में रोजगार बढ़ाने के लिए मनरेगा योजना प्रारंभ की. मगर योजना में व्याप्त भ्रष्टाचार ने उद्देश्यों पर पानी फेर दिया. गौर करने लायक यह कि सरकार के पास बेघरों का जो आंकड़ा है, वह भी वास्तविकता से परे है. सच तो यह है कि यह आंकड़ा सरकारी आंकड़ों से कहीं ज्यादा है. सरकार ने झुग्गी-बस्तियों में रहने वाले लोगों की आबादी निर्धारण का जो पैमाना निर्धारित किया है, वह तर्कहीन है. सरकारी पैमाने के अनुसार 20 से 25 घरों का समूह जिसमें छत या कंक्रीट की छत नहीं है, और जिसमें पीने योग्य पानी, शौचालय या नाले आदि की व्यवस्था नहीं है, उन्हें झुग्गी माना गया है.

awaas-yojnaलेकिन सरकार की परिभाषा में न समाने वाले बहुतायत लोगों की संख्या ऐसी भी है, जो येन-केन-प्रकारेण छत की व्यवस्था तो कर लिए हैं. परंतु बुनियादी सुविधाएं मसलन पानी, शौचालय और बिजली से महरूम हैं. अगर इनको सरकारी संख्या में शुमार कर दिया जाए तो झुग्गी-बस्तियों की संख्या करोड़ों में होगी. उचित होगा कि सरकार अपने पैमाने को दुरुस्त करे. सबसे पहले तो उसे गांवों और शहरों में रहने वाले बेघरों को बुनियादी सुविधाओं से लैस करना चाहिए. किसी से छिपा नहीं है कि शहरों की मलिन बस्तियों में लोगों को पानी के लिए घंटों लंबी कतारें लगानी पड़ती हैं. इसी तरह गांवों के अधिकांश लोगों को शौच के लिए खुले मैदान में जाना पड़ता है. सड़क और गांव, दोनों जगह सड़कें नदारद हैं, और सीवर नरक का अहसास कराता है. यह स्थिति सभ्य जीवन के मुंह पर तमाचा है.

सरकारें देश भर के शहरों में एजेंसियां-प्राधिकरणों के जरिए गरीबों को आवास देने के लिए बड़े पैमाने पर जमीनें अधिग्रहित करती हैं. लेकिन सचाई है कि उसका लाभ जरूरतमंदों को नहीं मिलता. बेहतर होगा कि सरकार ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के बेघरों को आवास उपलब्ध कराने के साथ निगरानी तंत्र भी विकसित करे जो सुनिश्चित करे कि योजना भ्रष्टाचार की भेंट न चढ़े. यह तथ्य है कि गांवों और शहरों में केंद्र व राज्य सरकारें गरीबों के कल्याण के लिए अनगिनत योजनाएं चला रही हैं. लेकिन विडंबना है कि सूचना अधिकार कानून के इस्तेमाल के बावजूद इन योजनाओं में आए दिन भ्रष्टाचार की खबरें उजागर होती हैं. उदाहरण के तौर पर गांवों में बेघरों को आवास उपलब्ध कराने के लिए दशकों से इंदिरा आवास योजना चल रही है. लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण है कि ग्राम प्रधानों के पक्षपातपूर्ण रवैये और कर्मचारियों की मिलीभगत से योजना का लाभ ऐसे लोगों को मिल रहा है, जो बेघर नहीं हैं. ऐसे में आवश्यक हो जाता है कि केंद्र व राज्य सरकारें  बेघरों को आवास उपलब्ध कराने की मानवीय योजना को मूर्त रूप देने के लिए दीर्घकालीन पारदर्शी रणनीति तैयार करें ताकि योजना के उद्देश्य को साधा जा सके.

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One Comment

  1. अक्षयकुमार क्षिरसागर
    Aug 15, 2016 at 10:59 am

    खुद कि जगह नहि हो तो क्या करनेका

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