मुगल काल में भी सस्ती एयर कंडीशनिंग प्रणाली के प्रमाण मिले

मुगल काल में भी भारत में सस्ती एयर कंडीशनिंग प्रणाली मौजूद थी

मुगल काल में भी भारत में सस्ती एयर कंडीशनिंग प्रणाली मौजूद थी। जिसके चिह्न 16वीं शताब्दी के दौरान बनीं इमारतों में आज भी देखे जा सकते हैं। सेंट्रल एयर कंडीशनिंग की तरह काम करने वाला सिस्टम सरहिंद में मुगल बादशाह जहांगीर की आरामगाह आमखास बाग में मौजूद हैं।

बेशक आज के दौर में अत्याधुनिक तकनीकों से भवनों को वातानुकूलित बनाया जा रहा है, लेकिन 16वीं शताब्दी में बनी इन इमारतों को भी उस समय की उपलब्ध तकनीक से वातानुकूलित किया गया था। हालांकि उस समय बिजली का प्रचलन नहीं था।

बता दें कि 1605 से 1621 ईस्वी के दौरान मुगल बादशाह जहांगीर ने सरहिन्द के आमखास बाग में अपनी आरामगाह बनवाई थी। बादशाह जहांगीर दिल्ली से लाहौर जाते समय यहां आराम करने के लिए रुकते थे। चार सौ साल पहले बनी इस इमारत को ठंडा और गर्म रखने के लिए पानी का इस्तेमाल किया जाता था। भवन की चूने से बनी चौड़ी तथा बड़ी दीवारों को ठंडा रखने के लिए उनमें मिट्टी के पाइप डाले गए थे।

एयर कंडीशनिंग प्रणाली के प्रमाण 

  • मुगल बादशाह जहांगीर की आरामगाह की दीवारों में एसी प्रणाली के चिह्न
  • भवन की पश्चिम दिशा में पानी की आपूर्ति के लिए बनाया गया था कुआंद्यमुगल बादशाह जहांगीर की आरामगाह की दीवारों में एसी प्रणाली के चिह्न
  • भवन की पश्चिम दिशा में पानी की आपूर्ति के लिए बनाया गया था कुआं

इन पाइपों में ठंडा पानी डालकर भवन के प्रत्येक हिस्से में घुमाया जाता था। जो गर्मियों में पूरे भवन को ठंडा रखता था। इसी प्रकार सर्दियों में भवन को गर्म रखने के लिए इन पाइपों में गर्म पानी डाला जाता था। दीवारों में डाले गए पाइपों के चिह्न आज भी मौजूद हैं। जर्जर हालत में पहुंच चुके इस भवन की पश्चिम दिशा में एक बड़े कुएं का निर्माण करवाया गया था। जहां से पानी लेकर भवन में लगे पाइपों में डाला जाता था।

सर्दियों में पानी को गर्म करने के लिए इन भवनों में विशेष तौर पर ब्वायलर बनाए गए थे। इन ब्वायलरों में आग जलाकर पानी को गर्म किया जाता था। ब्वायलरों को गर्म करने के लिए जलाई जाने वाली आग से निकले धुएं की कालिख भी आरामगाह की दीवारों पर दिखाई देती है।

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