मुद्दा : कृषक : सामाजिक स्थिति :अर्थव्यवस्था

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हमारे देशकी नींव दो लोगों के कंधे पर खड़ी है, इनमें प्रथम जवान हैं दूसरे किसान हैं। पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने नारा दिया था- जय जवान, जय किसान। वर्तमान सरकार के पिछले 18 महीने के कार्यकाल में कृषि के क्षेत्र को बहुत ही बेरहमी से कुचला गया है। कृषि भारतीय अर्थव्यस्था की रीढ़ है। केवल जीडीपी में इसका 16 प्रतिशत का योगदान है, बल्कि लगभग 50 प्रतिशत लोगों को कृषि क्षेत्र में रोजगार भी मिलता है। वर्ष 2008-09 में जब वैश्विक मंदी अपने चरम पर थी, दुनिया के शक्तिशाली राष्ट्र इसकी चपेट में आकर लड़खड़ाने लगे थे तब मांग और खपत के आधार पर ग्रामीण क्षेत्रों की आत्मनिर्भरता एवं सक्षमता के आधार पर हमारे देश ने सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में 8 फीसदी की दर से वृद्धि प्राप्त करने में सफलता हासिल की थी। ये सब संभव हुआ हमारे कृषि क्षेत्र एवं उसकी जनसंख्या के आधार पर।

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जब से केंद्र में मोदी सरकार सत्तासीन हुई है। राष्ट्र में कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के योगदान में कमी आई है। 2013-14 में कृषि क्षेत्र की विकास दर रिकाॅर्ड 4.7 प्रतिशत थी। यूपीए से एनडीए सरकार को सत्ता हस्तांतरण के पश्चात यह दर घटकर मात्र 1.1 प्रतिशत रह गई है। प्रधानमंत्री ने दो अंकों में जीडीपी में वृद्धि दर की बात की है, लेकिन उन्हें इस तथ्य को भी स्वीकार करना चाहिए कि जीडीपी में 9 प्रतिशत की विकास दर प्राप्त करने के लिए कृषि क्षेत्र में 4 प्रतिशत विकास दर आवश्यक है।

एनडीए शासन के दौर में 2003-04 में जहां कृषि निर्यात मात्र 7.5 अरब डॉलर था वहीं, यूपीए के पिछले 10 वर्षों के शासन काल में 2013-14 में यह 42.6 अरब डॉलर था। पिछली तीन फसलों में ही मोदी सरकार की गलत कृषि नीति एवं कुप्रबंधन के कारण 29 प्रतिशत की गिरावट अकेले गेहूं, चावल एवं मक्के की फसलों में दर्ज हुई हैं। हालांकि, केंद्र सरकार मेक इन इंडिया और व्यापार-व्यवसाय करने को आसान बनाने की बात जरूर करती है, लेकिन ये केवल नारों के शोर तक ही सीमित है। सरकार इस तथ्य को भुला बैठी है कि लगातार चौथी फसल खराब होने की तरफ अग्रसर है एवं सरकार ने किसान के हितों की लगातार अनदेखी की है।

 

देश के 640 जिलों में से 302 जिलों में 20 प्रतिशत औसत से कम बारिश हुई है, लगभग 50 प्रतिशत हिस्से मंे सूखे के हालात हैं। अल निनो की घटना के कारण इस वर्ष औसत वर्षा की तुलना में 14 प्रतिशत कम औसत वर्षां रिकाॅर्ड हुई है। सर्दी के मौसम में असमय वर्षा एवं प्राकृतिक प्रकोप के चलते किसानों की फसलों को नुकसान हुआ और लगभग 20 प्रतिशत गेहूं, 12 प्रतिशत दालों में उत्पादन में कमी दर्ज की गई।

हमारे देश में लगातार किसान प्रकृति की मार का दंश झेलने के लिए मजबूर है। आज के इस हताशा एवं निराशा के चक्रव्यूह में डूबे हमारे किसानों को बाहर निकालने के लिए आवश्यक है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य में वृिद्ध करके एवं महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना में अतिरिक्त रोजगार दिवस के अवसर उपलब्ध कराके कृषकों एवं कृषि मजदूरों को यह सरकार मदद पहुंचाए, लेकिन दुर्भाग्य से सरकार दोनों मोर्चों पर विफल रही है। 2013-14 मेंे खरीफ फसल पर यूपीए सरकार ने 420 रुपए अरहर पर, 135 रुपए मक्का पर और 300 रुपए काले सोयाबीन पर न्यूनतम समर्थन मूल्य की बढ़ोतरी की थी।

सूखे की स्थिति जानने के बावजूद वर्तमान एनडीए सरकार ने 2015-16 में इन्हीं फसलों पर 75 रुपए, अरहर पर 16.7 प्रतिशत 15 रुपए मक्के पर 16.7 प्रतिशत एवं 15 रुपए 11.1 प्रतिशत रुपए काले सोयाबीन के समर्थन मूल्य में बढ़ोतरी की। 2014 के लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने घोषणा की थी कि किसानों की फसल के न्यूनतम समर्थन मूल्य में 50 प्रतिशत की वृद्धि फसलों की उत्पादन लागत पर की जाएगी। किंतु सत्ता प्राप्त करने पश्चात इसी सरकार ने राज्य सरकारों को निर्देश जारी किया कि जो सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य पर बोनस देगी, उसके उत्पादन को एफसीआई द्वारा खरीदा नहीं जाएगा।

पूरे विश्व मं मनरेगा को रोजगार सृजन करने के मामले में अनोखी योजना माना गया है, लेकिन आज जब ग्रामीण क्षेत्र में आजीविका का संकट व्याप्त है एवं मनरेगा जैसी योजना के ज्यादा क्रियान्वयन की आवश्यकता है तब इसके मानव रोजगार दिवस में कटौती कर दी गई। वर्ष 2013-14 में जहां 220 करोड़ मानव रोजगार दिवस था वहीं, 2014-15 में 132 करोड़ तक सीमित रह गया है। मजदूरी, मुआवजा एवं बेरोजगारी भत्ते के भुगतान में 72 प्रतिशत राशि जारी करने में देरी की गई।

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नवंबर 2015 में उच्चतम न्यायालय ने भी मनरेगा के क्रियान्वयन को लेकर टिप्पणी की है तथा इसमें सुधार करने आवश्यकता बताई है। आज किसान हताश एवं निराश है, उन्हें किसी प्रकार की आशा की किरण दिखाई नहीं पड़ रही है। सहकारी बैंकों एवं अन्य तरह के कर्जों के भार से किसान बुरी तरह दबे हुए हैं। आजीविका चलाने के लिए अन्य कोई स्रोत उनके पास नहीं हैं कर्ज के बोझ तले दबे किसान आज आत्महत्या जैसा कदम उठाने पर मजबूर हैं। किसान अपने बच्चों का पालन-पोषण करने में भी खुद को असमर्थ पा रहे हैं। इस वर्ष केवल महाराष्ट्र के मराठवाड़ा अंचल में ही 1000 से ज्यादा किसानों ने आत्महत्या की है। यह केवल आरोप-प्रत्यारोप का विषय नहीं है, लेकिन सरकार का धर्म है कि वह किसानों को राहत पहुंचाने का उपाय करे।

आज कृषि क्षेत्र को लेकर जो स्थिति है वही स्थिति वर्ष 2006-07 में भी थी, लेकिन तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने किसानों की पीड़ा को समझते हुए एक मुश्त पूरे देश में किसानों का 72,000 करोड़ रु. का कर्ज माफ किया था। देश के 9 राज्यों ने अधिकृत तौर पर पर अपने यहां सूखा घोषित किया है एवं केंद्र सरकार से 25,000 करोड़ रुपए की राहत की मांग की है। आज समय की मांग है कि किसानों को पर्याप्त मुआवजा एवं बीमा की प्रीमियम राशि पर न्यायोचित फसल बीमा राशि प्रदान की जाए। किसानों के ऋण एवं बिजली के बिल माफ किए जाएं।

सरकार को किसानों की तकलीफ को गंभीरता से महसूस करना चाहिए। किंतु आज केवल चर्चा हो रही है, घोषणाएं बहुत हो रही हैं। धरातल पर कुछ नहीं हो रहा है। मेरे गृह राज्य मध्यप्रदेश में दिल दहलाने वाली घटनाएं प्रतिदिन हो रही हैं। वहां सरकार द्वारा सर्वे के नित नए मापदंड बनाए जा रहे हैं और जानबूझकर मुआवजे के लिए ऐसे मापदंड बनाए जा रहे हैं, जिसके कारण 90 प्रतिशत किसान मुआवजे के दायरे से बाहर हो गए हैं। यह बहुत कठिन समय है। किसान कराह रहा है, लेकिन सरकार कुंभकरण की नींद सोई हुई है, अपनी इस गहरी नींद से सरकार जागे और अच्छे दिन भारत को बनाने वाले इस देश के किसानों के लिए लाएं।

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