मुद्दा : क्या बुलेट ट्रेन परियोजना भारत में विकास में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन करेगा?

जिस देश में मेल-एक्सप्रेस ट्रेनें फिलहाल बैलगाड़ी की रफ्तार से चल रही हों, वहां जापान के साथ देश में पहली बुलेट ट्रेन चलाने के समझौते पर सहमति बनने की खबर ठंडी हवा के झोंके जैसी लगती है। इस संबंध में दिल्ली के हैदराबाद हाउस में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और जापान के पीएम शिंजो आबे के बीच हुए समझौते के मुताबिक मुंबई-अहमदाबाद के बीच बुलेट ट्रेन चलाने की योजना को मूर्त रूप दिया जाएगा। इससे देश के अन्य हिस्सों में भी हाईस्पीड ट्रेनों के आगमन का रास्ता खुल जाएगा। सबसे अहम बात यह है कि इस परियोजना के लिए जापान फिलहाल 12 अरब डॉलर का कर्ज बेहद सस्ती दरों पर मुहैया करा रहा है। जिस तरह जापान ने भारत में मेट्रो रेल चलाने के लिए कर्ज और इंफ्रास्ट्रक्चर मुहैया कराया, उसी तरह बुलेट ट्रेन के सपने को साकार करने में भी उसकी बड़ी भूमिका बन रही है। एक बार देश में बुलेट ट्रेन की राह खुल गई और शुरुआती प्रयोग कामयाब हो गए, तो मेट्रो की तरह बुलेट ट्रेन भी देश के दूरदराज के कई हिस्सों को जोड़ सकते हैं।

इस पहले बुलेट प्रोजेक्ट के तहत मुंबई-अहमदाबाद का मौजूदा रेल सफर महज दो घंटे में सिमटने की उम्मीद है। आगे चलकर इसी तरह कश्मीर से कन्याकुमारी और ओखा से गुवाहाटी व अन्य लंबी दूरियों की रेल यात्र में लगने वाले समय को उल्लेखनीय रूप से घटाया जा सकेगा। ध्यान रहे कि देश में बुलेट या हाई स्पीड ट्रेनों की बात काफी समय से हो रही है। वर्ष 2013 में भी भारत दौरे पर आए जापान के राजदूत तकेशी यागी ने गुजरात में दावा किया था कि भारत की पहली हाईस्पीड ट्रेन अहमदाबाद और मुंबई के बीच चलेगी। इससे भी काफी पहले से देश में 200 से 300 किमी प्रति घंटे से दौड़ने वाली बुलेट ट्रेनों का सपना देखा जा रहा है। पर खराब रेल पटरियों, उनके मेंटेनेंस, दोषपूर्ण सिग्नलिंग व्यवस्था और अनमैन्ड रेलवे क्रॉसिंग आदि समस्याओं के रहते हमारी ट्रेनों की सुस्त रफ्तार एक बड़ी समस्या रही है।

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देश में शताब्दी और राजधानी जैसी ट्रेनें कितनी धीमी गति से चल पाती हैं इसका एक उल्लेख दो साल पहले तत्कालीन रेल राज्य मंत्री केजे सूर्यप्रकाश रेड्डी संसद के शीतकालीन सत्र में राज्यसभा में कर चुके हैं। उन्होंने बताया था कि फिलहाल देश में ज्यादातर ट्रेनें 50 किलोमीटर प्रति घंटे की औसत गति से दौड़ पा रही हैं। उनके दिए आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2011-12 के दौरान मेल-एक्सप्रेस ट्रेनों की औसत गति 50 किमी प्रति घंटा रही, जबकि बड़े शहरों में चलने वाली ईएमयू या इलेक्टिकल मल्टीपल यूनिट्स की औसत गति 40 किमी प्रति घंटा रही। साधारण पैसेंजर ट्रेनें फिलहाल 36 किमी प्रति घंटे की औसत गति से ही चल पा रही हैं और सामान ढोने वाली मालगाड़ियां महज 25 किमी प्रति घंटे की औसत रफ्तार निकाल पा रही है। इस बीच यह भी गौरतलब है कि 2005-06 में दिल्ली-आगरा सेक्शन पर 150 किमी की गति वाली शताब्दी एक्सप्रेस देश की सबसे तेज रफ्तार रेलगाड़ी बनी थी। हालांकि यह रफ्तार भी बाद में घटाकर 130 किमी प्रति घंटे कर दी गई। रेलवे महकमे ने इसके पीछे टेक्निकल वजह बताई थी।

हमारे देश में ट्रेनों की यह औसत सुस्त रफ्तार देश में बीते कई दशकों से है, लेकिन उसके साथ ही यह सपना भी आम लोगों को दिखाया जाता रहा है कि भारत में भी बुलेट ट्रेनें चलेंगी। वर्ष 2012 में यह चर्चा तब और बढ़ गई थी, जब पड़ोसी देश चीन ने इस मामले में करिश्मा कर दिखाया। इससे यह भी लगा कि तेज रफ्तार ट्रेनों के मामले में दुनिया काफी आगे बढ़ गई है, जबकि भारतीय रेल एक सुस्त रफ्तार ट्रांसपोर्ट सिस्टम बनकर रह गया है। हाईस्पीड या बुलेट ट्रेन के मामले में चीन का करिश्मा उल्लेखनीय है। दुनिया के हाईस्पीड ट्रेन क्लब में सबसे देरी से यानी 2007 में शामिल हुए चीन ने अगले पांच वर्षो में दुनिया का सबसे लंबा हाईस्पीड रेल नेटवर्क बनाकर दिखा दिया कि इच्छाशक्ति हो तो नामुमकिन को भी मुमकि ठ्ठ अभिषेक कुमार जिस देश में मेल-एक्सप्रेस ट्रेनें फिलहाल बैलगाड़ी की रफ्तार से चल रही हों, वहां जापान के साथ देश में पहली बुलेट ट्रेन चलाने के समझौते पर सहमति बनने की खबर ठंडी हवा के झोंके जैसी लगती है। इस संबंध में दिल्ली के हैदराबाद हाउस में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और जापान के पीएम शिंजो आबे के बीच हुए समझौते के मुताबिक मुंबई-अहमदाबाद के बीच बुलेट ट्रेन चलाने की योजना को मूर्त रूप दिया जाएगा। इससे देश के अन्य हिस्सों में भी हाईस्पीड ट्रेनों के आगमन का रास्ता खुल जाएगा।

सबसे अहम बात यह है कि इस परियोजना के लिए जापान फिलहाल 12 अरब डॉलर का कर्ज बेहद सस्ती दरों पर मुहैया करा रहा है। जिस तरह जापान ने भारत में मेट्रो रेल चलाने के लिए कर्ज और इंफ्रास्ट्रक्चर मुहैया कराया, उसी तरह बुलेट ट्रेन के सपने को साकार करने में भी उसकी बड़ी भूमिका बन रही है। एक बार देश में बुलेट ट्रेन की राह खुल गई और शुरुआती प्रयोग कामयाब हो गए, तो मेट्रो की तरह बुलेट ट्रेन भी देश के दूरदराज के कई हिस्सों को जोड़ सकते हैं। इस पहले बुलेट प्रोजेक्ट के तहत मुंबई-अहमदाबाद का मौजूदा रेल सफर महज दो घंटे में सिमटने की उम्मीद है। आगे चलकर इसी तरह कश्मीर से कन्याकुमारी और ओखा से गुवाहाटी व अन्य लंबी दूरियों की रेल यात्र में लगने वाले समय को उल्लेखनीय रूप से घटाया जा सकेगा। ध्यान रहे कि देश में बुलेट या हाई स्पीड ट्रेनों की बात काफी समय से हो रही है। वर्ष 2013 में भी भारत दौरे पर आए जापान के राजदूत तकेशी यागी ने गुजरात में दावा किया था कि भारत की पहली हाईस्पीड ट्रेन अहमदाबाद और मुंबई के बीच चलेगी। इससे भी काफी पहले से देश में 200 से 300 किमी प्रति घंटे से दौड़ने वाली बुलेट ट्रेनों का सपना देखा जा रहा है। पर खराब रेल पटरियों, उनके मेंटेनेंस, दोषपूर्ण सिग्नलिंग व्यवस्था और अनमैन्ड रेलवे क्रॉसिंग आदि समस्याओं के रहते हमारी ट्रेनों की सुस्त रफ्तार एक बड़ी समस्या रही है। देश में शताब्दी और राजधानी जैसी ट्रेनें कितनी धीमी गति से चल पाती हैं इसका एक उल्लेख दो साल पहले तत्कालीन रेल राज्य मंत्री केजे सूर्यप्रकाश रेड्डी संसद के शीतकालीन सत्र में राज्यसभा में कर चुके हैं। उन्होंने बताया था कि फिलहाल देश में ज्यादातर ट्रेनें 50 किलोमीटर प्रति घंटे की औसत गति से दौड़ पा रही हैं।

 आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2011-12 के दौरान मेल-एक्सप्रेस ट्रेनों की औसत गति 50 किमी प्रति घंटा रही, जबकि बड़े शहरों में चलने वाली ईएमयू या इलेक्टिकल मल्टीपल यूनिट्स की औसत गति 40 किमी प्रति घंटा रही। साधारण पैसेंजर ट्रेनें फिलहाल 36 किमी प्रति घंटे की औसत गति से ही चल पा रही हैं और सामान ढोने वाली मालगाड़ियां महज 25 किमी प्रति घंटे की औसत रफ्तार निकाल पा रही है। इस बीच यह भी गौरतलब है कि 2005-06 में दिल्ली-आगरा सेक्शन पर 150 किमी की गति वाली शताब्दी एक्सप्रेस देश की सबसे तेज रफ्तार रेलगाड़ी बनी थी। हालांकि यह रफ्तार भी बाद में घटाकर 130 किमी प्रति घंटे कर दी गई। रेलवे महकमे ने इसके पीछे टेक्निकल वजह बताई थी। हमारे देश में ट्रेनों की यह औसत सुस्त रफ्तार देश में बीते कई दशकों से है, लेकिन उसके साथ ही यह सपना भी आम लोगों को दिखाया जाता रहा है कि भारत में भी बुलेट ट्रेनें चलेंगी। वर्ष 2012 में यह चर्चा तब और बढ़ गई थी, जब पड़ोसी देश चीन ने इस मामले में करिश्मा कर दिखाया। इससे यह भी लगा कि तेज रफ्तार ट्रेनों के मामले में दुनिया काफी आगे बढ़ गई है, जबकि भारतीय रेल एक सुस्त रफ्तार ट्रांसपोर्ट सिस्टम बनकर रह गया है। हाईस्पीड या बुलेट ट्रेन के मामले में चीन का करिश्मा उल्लेखनीय है।

दुनिया के हाईस्पीड ट्रेन क्लब में सबसे देरी से यानी 2007 में शामिल हुए चीन ने अगले पांच वर्षो में दुनिया का सबसे लंबा हाईस्पीड रेल नेटवर्क बनाकर दिखा दिया कि इच्छाशक्ति हो तो नामुमकिन को भी मुमकि ठ्ठ अभिषेक कुमार जिस देश में मेल-एक्सप्रेस ट्रेनें फिलहाल बैलगाड़ी की रफ्तार से चल रही हों, वहां जापान के साथ देश में पहली बुलेट ट्रेन चलाने के समझौते पर सहमति बनने की खबर ठंडी हवा के झोंके जैसी लगती है। इस संबंध में दिल्ली के हैदराबाद हाउस में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और जापान के पीएम शिंजो आबे के बीच हुए समझौते के मुताबिक मुंबई-अहमदाबाद के बीच बुलेट ट्रेन चलाने की योजना को मूर्त रूप दिया जाएगा। इससे देश के अन्य हिस्सों में भी हाईस्पीड ट्रेनों के आगमन का रास्ता खुल जाएगा। सबसे अहम बात यह है कि इस परियोजना के लिए जापान फिलहाल 12 अरब डॉलर का कर्ज बेहद सस्ती दरों पर मुहैया करा रहा है।

जिस तरह जापान ने भारत में मेट्रो रेल चलाने के लिए कर्ज और इंफ्रास्ट्रक्चर मुहैया कराया, उसी तरह बुलेट ट्रेन के सपने को साकार करने में भी उसकी बड़ी भूमिका बन रही है। एक बार देश में बुलेट ट्रेन की राह खुल गई और शुरुआती प्रयोग कामयाब हो गए, तो मेट्रो की तरह बुलेट ट्रेन भी देश के दूरदराज के कई हिस्सों को जोड़ सकते हैं। इस पहले बुलेट प्रोजेक्ट के तहत मुंबई-अहमदाबाद का मौजूदा रेल सफर महज दो घंटे में सिमटने की उम्मीद है। आगे चलकर इसी तरह कश्मीर से कन्याकुमारी और ओखा से गुवाहाटी व अन्य लंबी दूरियों की रेल यात्र में लगने वाले समय को उल्लेखनीय रूप से घटाया जा सकेगा। ध्यान रहे कि देश में बुलेट या हाई स्पीड ट्रेनों की बात काफी समय से हो रही है। वर्ष 2013 में भी भारत दौरे पर आए जापान के राजदूत तकेशी यागी ने गुजरात में दावा किया था कि भारत की पहली हाईस्पीड ट्रेन अहमदाबाद और मुंबई के बीच चलेगी। इससे भी काफी पहले से देश में 200 से 300 किमी प्रति घंटे से दौड़ने वाली बुलेट ट्रेनों का सपना देखा जा रहा है। पर खराब रेल पटरियों, उनके मेंटेनेंस, दोषपूर्ण सिग्नलिंग व्यवस्था और अनमैन्ड रेलवे क्रॉसिंग आदि समस्याओं के रहते हमारी ट्रेनों की सुस्त रफ्तार एक बड़ी समस्या रही है।

देश में शताब्दी और राजधानी जैसी ट्रेनें कितनी धीमी गति से चल पाती हैं इसका एक उल्लेख दो साल पहले तत्कालीन रेल राज्य मंत्री केजे सूर्यप्रकाश रेड्डी संसद के शीतकालीन सत्र में राज्यसभा में कर चुके हैं। उन्होंने बताया था कि फिलहाल देश में ज्यादातर ट्रेनें 50 किलोमीटर प्रति घंटे की औसत गति से दौड़ पा रही हैं। उनके दिए आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2011-12 के दौरान मेल-एक्सप्रेस ट्रेनों की औसत गति 50 किमी प्रति घंटा रही, जबकि बड़े शहरों में चलने वाली ईएमयू या इलेक्टिकल मल्टीपल यूनिट्स की औसत गति 40 किमी प्रति घंटा रही। साधारण पैसेंजर ट्रेनें फिलहाल 36 किमी प्रति घंटे की औसत गति से ही चल पा रही हैं और सामान ढोने वाली मालगाड़ियां महज 25 किमी प्रति घंटे की औसत रफ्तार निकाल पा रही है। इस बीच यह भी गौरतलब है कि 2005-06 में दिल्ली-आगरा सेक्शन पर 150 किमी की गति वाली शताब्दी एक्सप्रेस देश की सबसे तेज रफ्तार रेलगाड़ी बनी थी।

हालांकि यह रफ्तार भी बाद में घटाकर 130 किमी प्रति घंटे कर दी गई। रेलवे महकमे ने इसके पीछे टेक्निकल वजह बताई थी। हमारे देश में ट्रेनों की यह औसत सुस्त रफ्तार देश में बीते कई दशकों से है, लेकिन उसके साथ ही यह सपना भी आम लोगों को दिखाया जाता रहा है कि भारत में भी बुलेट ट्रेनें चलेंगी। वर्ष 2012 में यह चर्चा तब और बढ़ गई थी, जब पड़ोसी देश चीन ने इस मामले में करिश्मा कर दिखाया। इससे यह भी लगा कि तेज रफ्तार ट्रेनों के मामले में दुनिया काफी आगे बढ़ गई है, जबकि भारतीय रेल एक सुस्त रफ्तार ट्रांसपोर्ट सिस्टम बनकर रह गया है। हाईस्पीड या बुलेट ट्रेन के मामले में चीन का करिश्मा उल्लेखनीय है। दुनिया के हाईस्पीड ट्रेन क्लब में सबसे देरी से यानी 2007 में शामिल हुए चीन ने अगले पांच वर्षो में दुनिया का सबसे लंबा हाईस्पीड रेल नेटवर्क बनाकर दिखा दिया कि इच्छाशक्ति हो तो नामुमकिन को भी मुमकिन बनाया जा सकता है। चीन ने अपनी राजधानी बीजिंग और दक्षिणी चीन के औद्योगिक शहर

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