विश्व प्रसिद्ध रम्माण उत्सव

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रम्माण सीमांत जनपद चमोली के पैनखंडा क्षेत्र में आयोजित होने वाला मुखौटा शैली और भल्दा परंपरा का ऐसा पौराणिक नृत्य, जो अपनी विशिष्ट पहचान के कारण गांव के चौक से यूनेस्को के आंगन तक जा पहुंचा।

और आज यह नृत्य पूरे विश्व में शोध का विषय बना हुआ है। लगभग 500 साल पुरानी इस सांस्कृतिक विरासत में मुख्य रूप से नृत्य के जरिए रामकथा की प्रस्तुति दी जाती है। इसीलिए इसका रम्माण (रामायण) नाम पड़ा।

नृत्य शैली

  • प्रस्तुति का सबसे रोचक पहलू यह है कि इसमें कोई भी संवाद पात्रों के बीच नहीं होता। पूरी रम्माण में 18 मुखौटों, 18 तालों, एक दर्जन जोड़ी ढोल-दमाऊ व आठ भंकोरों के अलावा झांझर व मजीरों के जरिए भावों की अभिव्यक्ति दी जाती है।
  • मुखौटों के दो रूप हैंपहला- द्यो पत्तर यानी देवताओं के मुखौटे और दूसरा- ख्यल्यारी पत्तर यानी मनोरंजन के मुखौटे। हिमालय के आंचल में जोशीमठ प्रखंड की पैनखंडा पट्टी के सलूड गांव में 22 अप्रैल से विश्व प्रसिद्ध रम्माण कौथिग का आयोजन हो रहा है।

विकास

  • रम्माण कौथिग वर्ष 2007 तक पैनखंडा तक ही सीमित था। गांव के डॉ. कुशल सिंह भंडारी पेशे से शिक्षक हैं। उनकी मेहनत ने आज रम्माण को इस मुकाम तक पहुंचा दिया।
  • इन्होंने विलुप्ति के कगार पर जा पहुंची रम्माण को लिपिबद्ध कर इसका अंग्रेजी अनुवाद किया। यह अनुवाद गढ़वाल विश्वविद्यालय के लोक कला निष्पादन केंद्र की मदद से वर्ष 2008 में दिल्ली केइंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र पहुंचा।
  • केंद्र को रम्माण की प्राचीनता इस कदर भायी कि उसकी पूरी टीम सलूड गांव पहुंच गई। यहां रम्माण की प्रस्तुति ने उसे अभिभूत कर दिया। नतीजा केंद्र की ओर से रम्माण की 40 सदस्यीय टीम को दिल्ली बुलाया गया।
  • टीम ने वहां रम्माण की शानदार प्रस्तुतियां दीं। दो अक्टूबर 2009 को यूनेस्को ने इसे विश्व धरोहर घोषित कर दिया। तब 11-12 दिसंबर को जापानी मूल के होसिनो हिरोसी और यूमिको ने इसका प्रमाण पत्र गांववासियों को सौंप दिया।
  • इस सफलता का श्रेय निष्पादन केंद्र के प्रो. दाताराम पुरोहित, प्रसिद्ध छायाकार अरविंद मुद्गिल व रम्माण लोकजागर के एकमात्र गायक थान सिंह नेगी को जाता है।

d11805लोक के सरोकारों से वास्ता रखने वाले युवा संजय चौहान बताते हैं कि यूनेस्को व संस्कृति विभाग के सहयोग से आज गांव में रम्माण से जुड़े पौराणिक एवं पारंपरिक मुखौटों के लिए एक विशाल म्यूजियम तैयार किया जा रहा है। इस म्यूजियम में रम्माण से जुड़ी अन्य पौराणिक वस्तुओं को भी संग्रहीत किया जाएगा।

रम्माण के विशेष नृत्य

  1. बण्या-बण्याण: तिब्बत के व्यापारियों पर केंद्रित, अतीत में जिनका सब-कुछ चोरों ने लूट लिया था।
  2. म्योर-मुरैण: पहाड़ों में लकड़ी और घास काटने के लिए जाते समय जंगली जानवरों द्वारा किए जाने वाले आक्रमण का चित्रण
  3. माल-मल्ल: वर्ष 1804 से 1814 के दौरान स्थानीय लोगों व गोरखाओं के बीच हुए युद्ध का वर्णन
  4. कुरू जोगी: रम्माण का हास्य पात्र, जो अपने पूरे शरीर पर चिपकने वाली विशेष प्रकार की घास कुरू लगाकर लोगों के बीच चला जाता है। कुरू चिपकने के भय से लोग इधर-उधर भागते हैं, लेकिन कुरू जोगी उन पर अपने शरीर में चिपके कुरू को निकालकर फेंकता है।

One Comment

  1. Akshara Gautam
    Apr 24, 2016 at 9:58 am

    Sir art and culture ka kuch matter provide kar dijiye please

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