वीरप्पा मोइली संसदीय समिति : सांसद निधि में जिलाधिकारी की भूमिका सीमित करने सम्बन्धी सुझाव

वीरप्पा मोइली संसदीय समिति : सांसद निधि में जिलाधिकारी की भूमिका सीमित

सरकार को अगर संसदीय समिति का एक सुझाव पसंद आया तो सांसद निधि के तहत विकास कार्यो को मंजूरी देने का जिलाधिकारी का अधिकार छिन सकता है। ऐसा होने पर जिलाधिकारी का काम सिर्फ निगरानी तक सीमित हो जाएगा। समिति का कहना है कि यह बदलाव होने पर योजना का क्रियान्वयन प्रभावी ढंग से हो सकेगा।

वित्त मामलों संबंधी संसद की स्थाई समिति ने हाल में लोक सभा में पेश अपनी रिपोर्ट में कहा कि सरकार जिलाधिकारी से नीचे की रैंक के अधिकारी जैसे- सब डिवीजनल ऑफिसर को एमपीलैड के विकास कार्यो की मंजूरी का अधिकार प्रदान कर सकती है। साथ ही जिलाधिकारी या डिप्टी कमिश्नर को इस योजना की निगरानी की जिम्मेदारी सौंपी जा सकती है।

कांग्रेस के वीरप्पा मोइली की अध्यक्षता वाली समिति ने यह महत्वपूर्ण सुझाव सांख्यिकीय एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रलय की अनुदान की मांगों पर अपनी रिपोर्ट में दिया है। एमपीलैड(MPLAND) इसी मंत्रलय के अधीन आता है। उल्लेखनीय है कि फिलहाल एमपीलैड के तहत संसद सदस्य विकास कार्य की सिफारिश करते हैं जबकि उसे मंजूरी तथा क्रियान्वयन की जिम्मेदारी जिलाधिकारी की होती है। जिलाधिकारी के पास कई जिम्मेदारियां होने के कारण कई बार एमपीलैड के विकास कार्यो में देरी हो जाती है। यही वजह है कि मंत्रलय समिति के सुझाव पर अमल करने पर विचार कर रहा है।

समिति ने यह भी कहा है कि इस योजना के तहत खर्च हुई धनराशि के संबंध में प्रमाणपत्र राज्यों से शीघ्र मंगाने चाहिए। समिति ने इस बात पर भी नाखुशी जताई कि एमपीलैड के तहत होने वाले विकास कार्यो की गुणवत्ता सुनिश्चित करने का भी कोई तंत्र नहीं है। समिति ने नियमों में बार-बार बदलाव न करने को भी कहा है।

उल्लेखनीय है कि एमपीलैड योजना के लिए सरकार ने 3,950 करोड़ रुपये का आवंटन किया है। इस योजना के तहत कोई भी संसद सदस्य अपने निर्वाचन क्षेत्र में हर साल पांच करोड़ रुपये तक के विकास कार्य की सिफारिश कर सकता है।

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