संथारा एवं भारतीय समाज

जैनियों के संथारा प्रथा : राजस्थान उच्च न्यायालय का फैसला और उसका प्रभाव

  • जैन धर्म की प्राचीन धार्मिक प्रथा संथारा, जिसमें मृत्यु तक स्वैच्छिक उपवास किया जाता है, शरीर को समाप्त कर मुक्ति प्राप्त करने  की एक रस्म है. यह सर्वोच्च त्याग और महान धर्मपरायणता का कार्य है.
  • 10 अगस्त 2015 को राजस्थान उच्च न्यायलय के जयपुर पीठ ने मई 2006 में दायर की गई जनहित याचिका पर मौत के लिए उपवास पर रहने की जैनियों की सदियों पुरानी प्रथा के खिलाफ फैसला सुनाया.अपने फैसले में पीठ ने कहा कि संथारा को अब से “आत्महत्या”  माना जाएगा और तदनुसार यह भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) के प्रासंगिक धाराओं जैसे धारा 309 (आत्महत्या का प्रयास) और धारा 306 ( आत्महत्या के लिए उकसाना) के तहत दंडनीय होगा.
  • इसके बाद पीठ ने राज्य को निर्देश दिया कि– वह “किसी भी रूप में” इस प्रथा को ” बंद और समाप्त ” करेगा और इसके खिलाफ किसी भी शिकायत को “आपराधिक मामले के तौर पर ” दर्ज करेगा.

santhara-jain-way-of-death-with-equanimity-8-638.jpg

फैसला दो प्राथमिक आधार पर लिया गया

  • निखिल सोनी के मामले में फैसला दो प्राथमिक आधार पर दिया गया.पहला, जीने का अधिकार के गारंटी के दायरे में मरने का अधिकार का वादा नहीं आता और इसलिए संथारा प्रथा भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 द्वारा संरक्षित नहीं है.
  • दूसरा, संथारा एक धार्मिक प्रथा है और यह जैन धर्म का अनिवार्य हिस्सा नहीं है.इसलिए यहअनुच्छेद 25 द्वारा भी संरक्षित नहीं है जो लोगों की धार्मिक स्वतंत्रता और विवेक के अधिकार की गारंटी देता है.
    इस प्रकार पीठ ने कहा, ” हमने जैन संन्यासियों द्वारा अनुसरण किए जाने वाले किसी भी धर्मग्रंथ, उपदेश, लेख या प्रथाओं में यह नहीं पाया कि संथारा… को अनिवार्य धार्मिक प्रथा के रूप में माना जाता है, न ही यह मोक्ष के लिए जरूरी है. ”
    इसके अलावा यह तर्क दिया गया कि अनुच्छेद 25 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार सार्वजनिक हित, नैतिकता और स्वास्थ्य के अधीन है. और एक ऐसी प्रथा, चाहे वह प्राचीन ही क्यों न हो, को किसी के जीवन के अधिकार का उल्लंघन करने की अनुमति नहीं दी जा सकती है.
    अदालत ने कहा कि जीवन समाप्त करने, उसे त्यागने या मिटा देने को गरीमापूर्ण कार्य नहीं माना जा सकता है. मरने का अधिकार जीने के अधिकार का हिस्सा नहीं हो सकता.

आत्महत्या और संथारा में अंतर

यह सत्य  है कि आत्म हत्या और संथारा दोनों ही मानव जीवन की आत्म–परिशमन की पराकाष्ठा है लेकिन इसे करने वाले लोगों की मशा में बहुत अंतर है.

जहां एक तरफ आत्महत्या करने की प्रेरणा पीड़ा और निराशा से पैदा होने वाली चरम हताशा होती है, वहीं संथारा शुद्धिकरण के लिए खाना और पानी छोड़ने की धार्मिक प्रथा है, इसे गुरु से परामर्श के साथ किया जाता है और इसमें विस्तृत प्रक्रियाओं का पालन किया जाता है. यह आवेशपूर्ण या अहंकारी कार्य नहीं हो सकता.

फैसले का प्रभाव

निखिल सोनी बनाम भारत संघ पर आए इस फैसले का न सिर्फ राजस्थान  के जैन समुदाय में बल्कि देश भर में दूरगामी प्रभाव पड़ने की संभावना है. दुर्भाग्यवश यह संवैधानिक कानून के कई महत्वपूर्ण मुद्दों को एक साथ मिलाता है और हमारे संवैधानिक न्यायशास्त्र में धार्मिक स्वतंत्रता की मौलिक गारंटी पर भ्रम पैदा करता है. हमारे विश्वास आधारित समाज में जो धार्मिक भावना के सार्वजनिक प्रदर्शन को स्वीकार और यहां तक की प्रोत्साहित करता है, में “सामाजिक” और “धार्मिक” पहलु अभिन्न रूप से आपस में जुड़े हैं.
इसलिए राजस्थान उच्च न्यायालय के फैसले का पहला प्रभाव यह होगा कि जैन धर्म के लोग इस के खिलाफ होंगे और इस फैसले को धर्म के दायरे और खासकर उनके धर्म में, राज्य के अनुचित अतिक्रमण बताते हुए इसके विरोध में उतर आएंगे. कई लोग इसे व्यक्तियों (अनुच्छेद 25) और धार्मिक संस्थानों से संबंधित ( अनुच्छेद 26) धार्मिक स्वतंत्रता और अभ्यास के संवैधानिक गारंटी अधिकार के उल्लंघन के रूप में देखेंगे.
इस तथ्य के अलावा कि हम व्यापक अर्थों में विश्वास– आधारित समाज हैं, हमारे समाज में कई धर्म भी हैं. इसलिए संथारा पर यह फैसला अन्य धर्मों–खासकर उन प्रथाओं और अभ्यासों पर जिनमें कानूनी और संवैधानिक प्रावधानों के संदर्भ में बारीक रेखा है, की प्रथाओं और अभ्यासों को मानने वालों पर अप्रत्यक्ष प्रभाव पड़ सकता है. उदाहरणस्वरुप  जिन राज्यों में शराब पीने पर प्रतिबंध हैं वहां चर्च के अनुष्ठानों में शराब का उपयोग वाली प्रथा बाल– दीक्षा और ऐसी ही अन्य प्रथाएं.
निष्कर्ष
पश्चिम की धारणाओं से काफी अलग भारतीय धर्मनिरपेक्षता निर्विवाद है– इसमें जहां सामान्य सामाजिक कल्याण या पर्याप्त नागरिक स्वतंत्राता दांव पर लगी हो वहां धर्म के मामलों में राज्य के हस्तक्षेप की परिकल्पना की गई है. लेकिन हमारे संविधान ने इस बात की उचित व्याख्या की है कि संविधान इस बात की अनुमति नहीं देता कि अदालत का कोई भी विशेष विचार हमें यह बताए कि हम जिस धर्म को मानते हैं उसकी कौन सी मान्यताएं और प्रथाएं अनिवार्य हैं.

Comments (3)

  1. Rajat Agarwal
    Apr 17, 2016 at 12:01 am

    Very nice information thanks a lot

  2. sujata
    Apr 18, 2016 at 4:24 pm

    Well written article..thnxx team

    • upscgetway
      Apr 19, 2016 at 12:24 pm

      thanks sujata

Leave a Comment

Your email address will not be published.