सुखा /बाढ़ के आलोक में नीतिगत खामियां

14131028730_430473d81dदो वर्षो से लगातार कम बारिश होने से देश का लगभग एक चौथाई क्षेत्र इस समय सूखे और उसके दुष्परिणास्वरूप गंभीर जल संकट की चपेट में है। इसकी आशंका पहले से थी। मौसम वैज्ञानिकों ने भी यह भविष्यवाणी की थी कि इस साल भीषण गर्मी पड़ेगी, जिससे जल संकट और अधिक गहराएगा। भारतीय उपमहाद्वीप में मौसम के दुष्चक्र के वैज्ञानिक कारण हैं। विश्व के एक हिस्से में जब पर्यावरण चक्र अल नीनो का प्रकोप होता है तो उसका प्रभाव भारतीय उपमहाद्वीप में मौसम चक्र पर पड़ता है।

प्रत्येक सात-आठ वर्ष में पड़ने वाले इस दुष्प्रभाव का असर लगातार दो साल रहता है। हमारे नीति-नियंता इस तथ्य से अवगत थे कि अल नीनो के कारण बारिश कम होगी और इसके चलते देश का अच्छा-खासा भाग सूखे की चपेट में आ जाएगा, लेकिन वे हाथ पर हाथ धरे बैठे रहे। पिछले कई वर्षो के मौसम संबंधी आंकड़े भी अत्यधिक गर्मी-सर्दी या फिर कम-ज्यादा बारिश की तस्वीर पेश कर रहे हैं।

केंद्र और राज्यों को इन स्थितियों से निपटने के लिए तैयार रहना चाहिए था, लेकिन यह तैयारी नजर नहीं आई। सूखे से सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्रों में से एक महाराष्ट्र का मराठवाड़ा इलाका है। इसके अलावा बुंदेलखंड के खराब हालात की भी चर्चा है। मराठावाड़ा लगातार दूसरे वर्ष सूखे का सामना कर रहा है। वहां के हालात बेहद गंभीर हैं। ऐसे हालात तब हैं जब महाराष्ट्र में अरबों रुपये खर्च करके बांध और नहरों का जाल बिछाया गया। इस संजाल का कोई खास असर नजर नहीं आ रहा है। इसकी एक बड़ी वजह यह है कि जल संसाधनों का दुरुपयोग किया गया। इस इलाके में सूखे जनित समस्याएं अचानक नहीं उभरीं। वे वर्षो की लापरवाही और निष्क्रियता का परिणाम है।

आम तौर पर हम सूखे और बाढ़ जैसी आपदाओं को नियति की देन मान लेते हैं, जबकि सच्चाई यह है कि पानी के बेहतर प्रबंधन और समय रहते किए गए उपायों से इन आपदाओं के असर को एक हद तक नियंत्रित किया जा सकता है। सूखे के बाद जब बारिश होती है तब प्रचुर मात्र में पानी उपलब्ध होता है, लेकिन जल के समुचित प्रबंधन के अभाव में वह या तो मुसीबत बन जाता है या फिर बर्बाद हो जाता है। ऐसा इसलिए और भी होता है, क्योंकि जल के परंपरागत स्नोत या तो पूरी तरह समाप्त हो गए हैं या फिर उचित रखरखाव के अभाव में नष्ट हो रहे हैं। किसी समय छोटे-बड़े तालाब ग्रामीण क्षेत्रों में जल भंडारण का प्रमुख माध्यम हुआ करते थे, लेकिन अब उनका अस्तित्व ही मिटता जा रहा है।

download (1)यही हाल नहरों का भी है। चूंकि तालाबों-नहरों के रखरखाव की परवाह नहीं की गई इसलिए किसान सिंचाई के लिए बारिश या फिर भूमिगत जल पर ही आश्रित होकर रह गए। अब तो देश के कई इलाकों में भूमिगत जल का स्तर भी नीचे होता जा रहा है। किसानों के आर्थिक संकट का सबसे बड़ा कारण सिंचाई के साधनों का अभाव है। रही-सही कसर कृषि के आधारभूत ढांचे की जर्जर स्थिति ने पूरी कर दी है। देश के ज्यादातर हिस्सों में किसानों ऐसी स्थिति में हैं कि अगर उन्हें एक वर्ष भी सिंचाई के लिए पर्याप्त पानी न मिले तो उनकी कमर टूट जाती है। ऐसा इसलिए और भी होता है, क्योंकि बहुत कम किसान दुधारू पशु रखते हैं या आय के अन्य स्नोतों पर निर्भर होते हैं। लगता है कि हमारे नीति-नियंताओं ने इस बारे में कभी सोचा ही नहीं कि सूखे के समय किसान अपनी आजीविका कैसे चलाएंगे? चूंकि खेती-किसानी के तौर-तरीके भी परंपरागत बने हुए हैं इसलिए भी कम बारिश और सूखा किसानों के साथ-साथ ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर बहुत भारी पड़ता है।

सूखे एवं बाढ़ पर उच्चतम न्यायालय का रुख 

पिछले दिनों उच्चतम न्यायालय ने सूखे को लेकर दायर जनहित याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए केंद्र और राज्यों को फटकार लगाते हुए सवाल किया कि इस समस्या से निपटने के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं? इस सवाल की नौबत नहीं आनी चाहिए थी। भले ही केंद्र सरकार सूखाग्रस्त इलाकों को राहत देने के लिए तत्पर हुई हो और इस क्रम में मराठवाड़ा के कुछ इलाकों में ट्रेन से पानी पहुंचाने जैसा अभूतपूर्व कदम उठाया गया हो, लेकिन यह भी सच है कि यह सब तब हुआ जब पानी की किल्लत ने गंभीर संकट खड़ा कर दिया। बेहतर होता कि इस संकट की गंभीरता का अनुमान पहले ही लगा लिया जाता। सूखे के समय खाद्यान्नों और फल-सब्जियों के दाम आसमान छूने लगते हैं।

ऐसे हालात में जमाखोरी होती है, जो महंगाई को बढ़ाती है। यह सरकारों की जिम्मेदारी है कि वे समय रहते ऐसे उपाय करें जिससे न तो जमाखोरी हो सके और न ही खाद्यान्नों एवं फल-सब्जियों के दाम बेलगाम हो सकें। मूलत: यह काम राज्यों का है, लेकिन वे तब तक हाथ पर हाथ धरे बैठे रहते हैं जब तक हालात नियंत्रण से बाहर न हो जाएं। पिछले दिनों केंद्रीय जल संसाधन मंत्री उमा भारती ने यह अजीब बयान दिया कि सूखे से निपटने की योजना नहीं बनाई जा सकती। यह कथन नीति-निर्धारकों की गलत सोच को दर्शाता है। सूखे जैसे संकट का सामना सही और समय पर की जाने वाली तैयारियों से किया जा सकता है। कई देश ऐसे हैं जहां भारत के मुकाबले कहीं कम पानी बरसता है, लेकिन वे जल प्रबंधन इतने अच्छे ढंग से करते हैं कि सभी आवश्यकताओं को आसानी से पूरा कर लेते हैं।

इन देशों में जल के उपयोग संबंधी नियमों पर अमल के मामले में वहां की जनता भी जागरूक है। जल प्रबंधन की आधुनिक तकनीक में से कुछ का अपने देश में भी इस्तेमाल हो रहा है, लेकिन इस मामले में अभी बहुत कुछ करना शेष है।1मौसम चक्र में बदलाव और भूमिगत जल के स्तर में तीव्र गिरावट ने एक बड़े खतरे की घंटी बजा दी है। इसकी एक बानगी यह भविष्यवाणी है कि 2050 तक पेयजल की किल्लत इतनी गंभीर होगी कि पीने के पानी का आयात करना पड़ेगा। ऐसे खतरे की आशंका के बाद हमारे नीति-नियंताओं को चेत जाना चाहिए। सच तो यह है कि उन्हें दस-बीस साल पहले तभी चेत जाना चाहिए था जब बढ़ते प्रदूषण और पर्यावरण परिवर्तन के खतरों के प्रति विश्व को आगाह किया जा रहा था। अभी भी वक्त है। हमारे नीति-नियंताओं और वैज्ञानिक समुदाय को मिलकर इस चुनौती का सामना करने के लिए जुट जाना चाहिए। इसके लिए नई नीतियों के निर्माण के साथ उन पर प्रभावी अमल भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए।

किसी भी तरह की समस्याओं से निपटने में दूरदर्शिता और समय पर सही कदमों का कोई विकल्प नहीं, लेकिन अपने देश में समस्या यह है कि हमारे नीति-नियंता हर समस्या का फौरी या फिर आधा-अधूरा समाधान ही खोजते हैं। उदाहरण के लिए दिल्ली में प्रदूषण से निपटने के लिए सम-विषम संख्या वाली निजी कारों का बारी-बारी से संचालन एक गंभीर समस्या का फौरी समाधान ही है। जब तक प्रदूषण के बुनियादी कारणों का निवारण नहीं होता, तब तक सम-विषम फामरूले का कोई मतलब नहीं। बेहतर हो कि हमारे नीति-नियंता सूखे-बाढ़ अथवा प्रदूषण के दीर्घकालिक और स्थायी उपाय खोजना और उन पर अमल करना सीखें। यह इसलिए अनिवार्य है, क्योंकि इसके बिना देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत नहीं बनाए रखा जा सकता

Leave a Comment

Your email address will not be published.