हरियाणा (राखी गढ़ी गांव) : खोदाई के दौरान पहली बार हाथी का कंकाल मिला

हरियाणा में खोदाई में मिला हाथी का कंकाल 

05_03_2016-hathiहड़प्पाकालीन सभ्यता की खोज को लेकर राखी गढ़ी गांव में साइट नंबर दो पर खोदाई के दौरान पहली बार हाथी का कंकाल मिला है। इसका डीएनए टेस्ट किया जाएगा। अभी तक मानव कंकाल ही मिल रहे थे।

राखीगढ़ में हड़प्पा सभ्यता को पूरी तरह से उजागर करने में डेक्कन यूनिवर्सिटी पुणो व पुरातत्व विभाग हरियाणा की तरफ से कार्य किया जा रहा है। साइट नंबर दो की खोदाई में एक जगह पर अलग-अलग पशुओं की हड्डियां मिली है।

वहीं एक जगह पर एक पशु कंकाल मिला है। विशेषज्ञों ने इसकी जांच की तो हाथी कंकाल होने की पुष्टि हुई। हाथी का कंकाल मिलने से पुरातत्व विशेषज्ञों की उम्मीद राखीगढ़ी से और बढ़ गई है।

इससे हड़प्पाकालीन संस्कृति के इतिहास में एक अध्याय और जुड़ गया है। विशेषज्ञों के अनुसार हाथी का उपयोग उस समय किस कार्य में होता था, वह पालतू था या जंगली था, यह शोध का विषय है।

खोदाई के दौरान कुत्तों व बैलों की आकृतियां पहले ही मिल चुकी हैं। हाथी के कंकाल को डीएनए टेस्ट के लिए पुणो की डेक्कन यूनिवर्सिटी में ले जाया जाएगा।

हरियाणा का राखीगढ़ी गांव

हरियाणा के हिसार से करीब 42 किलोमीटर हांसीजींद रोड पर राखीगढ़ी गांव में मिले हजारों साल पुरानी सभ्यता के अवशेष उत्सुकता जगाने वाले हैं. पुरातत्त्व में रुचि रखने वाले कुछ लोग दूरदूर से यहां आ रहे हैं. आबादी से सटे हुए एक टीले पर उत्खनन का काम चल रहा है. डेक्कन यूनिवर्सिटी के शोधार्थियों और पुरातत्त्व विभाग द्वारा कराई जा रही खुदाई टीले की ऊंचाई से शुरू हो कर बिलकुल नीचे तक आ गईर् है. गांव की समतल जमीन से करीब 20 मीटर नीचे तक उत्खनन में तरहतरह के अवशेष मिल रहे हैं और नैचुरल मिट्टी अभी तक दिखाई नहीं दी है.

Mohenjo-daroपुरातत्त्ववेत्ता टीले के नीचे 3-3 सभ्यताओं का दावा कर रहे हैं. इस उत्खनन से पुरातत्त्ववेत्ताओं को 2,500 से 5 हजार साल पुरानी सभ्यताओं के प्रमाण मिल रहे हैं. पुरातत्त्ववेत्ता भारतीय उपमहाद्वीप में हड़प्पा सभ्यता की 5 बड़ी आबादी में से एक राखीगढ़ी के होने का दावा कर रहे हैं. सिंधु घाटी सभ्यता विश्व की प्राचीन नदीघाटी सभ्यताओं में से एक है. इस का विकास सिंधु और घग्घर के किनारे हुआ. मोहनजोदड़ो, कालीबंगा, लोथल, धोलावीरा, राखीगढ़ी और हड़प्पा इस के प्रमुख केंद्र माने जाते हैं. ब्रिटिशकाल में हुई खुदाई के आधार पर इतिहासकारों और पुरातत्त्ववेत्ताओं का अनुमान है कि यह अत्यंत विकसित सभ्यता थी और ये शहर अनेक बार बसे व उजड़े थे. इस सभ्यता के खोजे गए केंद्रों में से ज्यादातर स्थल सरस्वती नदी और उस की सहायक नदियों के आसपास हैं. अभी तक कुल खोजों में से 3 फीसदी का भी उत्खनन नहीं हो पाया है.

हर टीले की अपनी विशेषता

पुरातत्त्ववेत्ताओं का मानना है कि इस सभ्यता का क्षेत्र विश्व की सभी प्राचीन सभ्यताओं के क्षेत्र से कई गुना विशाल था. दरअसल, राखी-गढ़ी 2 जुड़वां गांव हैं. राज्य सरकार के राजस्व रिकौर्ड में राखी शाहपुर और राखीखास 2 अलगअलग गांव हैं. लेकिन दोनों गांवों के क्षेत्र में पुरानी विरासत मिलने के कारण पुरातत्त्व विभाग ने इन गांवों को अंतर्राष्ट्रीय विरासत के लिए एक ही नाम राखीगढ़ी दे दिया है. गांव के करीब 350 एकड़ में 9 टीले मिले हैं जो विशाल क्षेत्र में फैले हुए हैं. पुरातत्त्व विभाग ने इन टीलों को 1 से 9 नंबर तक नाम दे रखे हैं. हरेक टीले की अपनी अलग विशेषता है. इन में से 5 टीले एकदूसरे से जुड़े हुए हैं. इन में 2 टीले कम घनत्व आबादी क्षेत्र के हैं. मौजूदा प्रोजैक्ट में टीला नंबर 4, 6 और 7 में खुदाई चल रही है. टीला नंबर 1, 2, 3 व 5 पुरातत्त्व विभाग के कब्जे में हैं जबकि 4 नंबर का कुछ हिस्सा और 6, 7, 8 व 9 किसानों द्वारा जोते जाते हैं.

हर टीले की अपनी विशेषता है. टीला नंबर 6 हड़प्पनों का आवासीय क्षेत्र था. इस से पता चलता है कि वे लोग कैसे रहते थे. टीला नंबर 4 से अनुमान है कि वे यहां कब, कैसे स्थापित हुए. पुरातत्त्ववेत्ताओं का अनुमान है कि जब ये बाशिंदे यहां आए थे तो टीला नंबर 6 पर बसे थे. यहां हड़प्पाकाल से पूर्व के तथ्य भी मिले हैं. टीला नंबर 7 में हाल ही में 4 नर कंकाल मिले हैं. इन में से 2 पुरुषों के 1 स्त्री का और 1 बच्चे का है. कंकाल के पास मिट्टी के बरतन और अनाज मिले हैं. चूडि़यां भी मिली हैं. कहा जा रहा है कि उस समय के लोग पुनर्जन्म में यकीन रखते थे.

Pune_Indus_civilization-4मृत आदमी की लंबाई 5.7 इंच, उम्र करीब 50 साल, औरत की लंबाई 5.4 इंच,  उम्र करीब 30 साल और बच्चे की उम्र लगभग 10 साल होने का अनुमान है. यहां और भी कंकाल हैं. यह जगह शहर के बाहरी हिस्से में कब्रगाह थी. करीब 50 एकड़ क्षेत्र में फैले इस टीले में स्मारक भी मिले हैं. कुछ जानकारों का कहना है कि यह मध्यकाल का हो सकता है हालांकि अभी कंकालों की रेडियो कार्बन डेटिंग व डीएनए नहीं कराया गया है. इन्हें डेक्कन कालेज एंड रिसर्च इंस्टिट्यूट, पुणे भेजा गया है.

टीला नंबर 4 की खुदाई स्थल पर डेक्कन यूनिवर्सिटी के शोधार्थी योगेश यादव कहते हैं कि हम इस टीले की ऊर्ध्वाकार यानी खड़ी खुदाई कर रहे हैं. हमारा उद्देश्य यह पता करना है कि टीला नंबर 4 का कल्चरल सीक्वैंस (सांस्कृतिक अनुक्रम) क्या है. हम इस कल्चरल सीक्वैंस को फिर से बनाना चाहते हैं ताकि हम जान सकें कि यहां पहले कौन आया. उन लोगों ने शहरीकरण अवस्था में प्रवेश किया तो क्याक्या परिवर्तन हुए. योगेश परत दर परत निकल रही दीवारों को दिखाते हुए कहते हैं कि यहां खुदाई की मिट्टी की विभिन्न रंगों की परतें दर्शाती हैं कि यहां 3 अलगअलग काल की सभ्यताएं रही हैं. खुदाई मेें घर के अंदर ईंटों से बना एक विशाल स्टोरेजरूम निकला था. इस के पास कमरा है. इस टीले के नीचे 2 हजार से 5 हजार साल के दौरान 8 बार घर बन चुके हैं. इसी यूनिवर्सिटी के शोधार्थी नागराज कहते हैं कि मिट्टी के अंदर से आकर्षक पत्थर निकल रहे हैं. यहां के लोग आपस में पत्थर का व्यापार करते थे क्योंकि यहां जो पत्थर मिले हैं वे अफगानिस्तान और पाकिस्तान के हैं. गुजरात में खंबात की खाड़ी के पास के पत्थर भी हैं. यानी जेवरों का चलन और व्यापार उस जमाने में शुरू हो गया था. नागराज सिंधु घाटी सभ्यता में खोजे गए शहरों की खुदाईर् में निकले मोहक स्टोन और उस के व्यापार को ले कर शोध कर रहे हैं.     

heitzmann-mehrgarhटाइगर की आकृति वाली मुहर भी मिली है जो व्यापार के लिए इस्तेमाल की जाती थी. विभिन्न प्रकार के औजार मिले हैं जो शिकार और मछली पकड़ने के काम आते थे. मछली पकड़ने के लिए तांबे के बने हुक मिले हैं. पौराणिक चरित्र वाले खिलौने प्राप्त हुए हैं. दरअसल, 1993 में पुरातत्त्व विभाग ने राखीगढ़ी की यह जमीन ले ली थी. इस से कुछ वर्ष पहले पता चला था कि राखीगढ़ी प्राचीन हड़प्पा, मोहनजोदड़ो सभ्यता का विशाल हिस्सा है. यह घग्घर नदी के किनारे बसा हुआ था. हड़प्पा, मोहनजोदड़ो (पाकिस्तान), धोलावीरा (गुजरात) और कालीबंगा (राजस्थान) के बाद राखीगढ़ी बड़ा शहर था. 2012 से पुरातत्त्व विभाग के साथ डेक्कन कालेज एवं रिसर्च इंस्टिट्यूट, पुणे मिल कर खनन करवा रहा है. बीचबीच में विदेशी विश्वविद्यालयों के शोधार्थी भी आतेजाते हैं. इन में दक्षिण कोरिया की सिओल यूनिवर्सिटी के रिसर्च स्कौलर भी उत्खनन के लिए आ चुके हैं. खुदाई से जाहिर हुआ है कि यहां सुव्यवस्थित नगरीय व्यवस्था थी. हड़प्पा काल के अन्य शहरों की भी बसावट नियोजित तरीके से थी. यहां बनाईर् गई पक्की ईंटों के मकान मिल रहे हैं और समुचित ड्रेनेज व्यवस्था थी. घरों में बड़े कमरे, अनाज भंडारण, स्नानागार बने हैं. मिट्टी के फर्श पर जानवरों की बलि के गड्ढे, तिकोने और गोल हवनकुंड आदि उस काल के रीतिरिवाजों के प्रमाण खुदाई में मिले हैं. उस काल में सिरेमिक उद्योग पनप चुका था. प्रमाण के तौर पर भांड, तश्तरी, गुलदान, पानदान, जाम, जार, प्लेटें, कप, प्याले, हांडी आदि चीजें मिल रही हैं.

One Comment

  1. rakesh
    Feb 06, 2019 at 10:38 am

    desh ki dharohar ko bachao sarkar ko jagao ki hamein apna itihas pata chal sake.

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