124वां संविधान संशोधन विधेयक (103वां संविधान संशोधन अधिनियम) : आर्थिक आधार पर सामान्य वर्ग को 10% आरक्षण

👉 चर्चा_में_क्यों 👇👇
 
124वां संविधान संशोधन विधेयक 9 जनवरी 2019 को संसद में #अनुच्छेद_368 【संवैधानिक संशोधन】के विशेष बहुमत से पास हुआ, जिसके तहत आर्थिक रूप से कमजोर सामान्य वर्ग को शैक्षणिक संस्थाओं में एवम रोजगार में 10% आरक्षण का प्रावधान किया गया है।
👉 संशोधित प्रावधान : अनुच्छेद 368 👇👇
 
इसके लिए संविधान के अनुच्छेद_15 और अनुच्छेद_16 में संशोधन करके क्रमशः दोनों में हीं क्लॉज़ 6 जोड़ा को गया है-
 
अनुच्छेद_15(6)(a) – इसके अनुसार राज्य क्लॉज़ 4 और क्लॉज़ 5 में वर्णित वर्गों से इतर आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए विशेष प्रावधान लागू कर सकेगा।
अनुच्छेद_15(6)(b)– इसके अनुसार ऐसे वर्गों को शिक्षा संस्थाओं में 10% आरक्षण दिया जायेगा।
 
अनुच्छेद_16(6) – इसी अनुच्छेद के क्लॉज़ 4 में वर्णित वर्गों से इतर आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए नियुक्तियों या पदों में अधिकतम 10% आरक्षण की सुविधा मिलेगी।
 
यह 10% कोटा ,SCs/STs और OBCs के कुल 49.5% आरक्षण से अलग होगा।
                                             
 
आर्थिक आधार पर गरीब सवर्ण लाभार्थी : शर्ते 👇
 
सालाना आय 8 लाख या उससे कम,
5 एकड़ या उससे कम कृषि योग्य भूमि,
1000 गज या उससे कम का फ्लैट,
अधिसूचित नगरीय छेत्र में100 गज या उससे कम का फ्लैट,
गैर अधिसूचित नगरीय छेत्र में 200 गज या उससे कम का फ्लैट,
👉 पृष्ठभूमि : सबंधित वाद : सुप्रीम कोर्ट 👇
 
एम.आर. बालाजी v/s मैसूर राज्य 【1962】- सुप्रीम कोर्ट ने विशेष कोटे में 50% से अधिक आरक्षण को असंवैधानिक बताया।
 
मंडल आयोग 【1990】 की सिफारिश पर वी.पी. सिंह सरकार द्वारा सरकारी सेवाओं में OBCs को 27% आरक्षण लागू किया गया
 
नरसिम्हा राव सरकार ने 【1991】में आर्थिक आधार पर 10% आरक्षण देने का प्रावधान किया
 
इंदिरा साहनी बनाम भारत संघ【1992】 में सुप्रीम कोर्ट ने इस 10% कोटे को रद्द कर दिया।
 
विभिन्न राज्य सरकारे इसके लिए समय समय पर कोशिश करती रही हैं लेकिन कोर्ट में जाने के बाद यह कोशिश नाकाम हो जाती है ।
 
👉 10% आरक्षण : आर्थिक रूप से गरीब सवर्ण बनाम सुप्रीम कोर्ट
 
हालांकि इस बार का प्रावधान संविधान संशोधन के बाद लाया जा रहा है और सरकार का तर्क है कि इसे सुप्रीम कोर्ट भी रद्द नही कर सकती
 
परंतु सुप्रीम कोर्ट पहले भी 99वां संवैधानिक संशोधन अधिनियम(NJAC ACT) को असंवैधानिक घोषित कर चुकी है, जो की संविधान संशोधन के बाद ही बनाया गया था
अतः कोर्ट इसमें भी दखल दे सकती है।
 
 बहस / आलोचना / प्रश्न 👇👇
 
आयकर स्लैब के अनुसार 5 लाख से 10 लाख आय अर्जित करने वालो को 20% टैक्स का भुगतान करना पड़ता है , तो 8 लाख से कम आय वाला सवर्ण गरीब की श्रेणी में कैसे आएगा ?
प्रश्न : तो क्या सरकार आयकर स्लैब में परिवर्तन करेगी ? क्योंकि दोनों ही रूप में विरोधाभाष उत्पन्न हो जाएगा । और लोगों में इस उहापोह की स्थिति में वैमनस्य की भावना जन्म लेगी
 
कुछ लोगो का मानना है कि नौकरी कम होने की वजह से इसका कोई खास फायदा नही होगा,
जिसका स्वयं वर्तमान सरकार के विभिन्न मंत्रियों और प्रवक्ताओं ने विभिन्न मंचो से जनता को बताया है कि आरक्षण का कोई फायदा नही है क्योंकि सरकारी नौकरियों के अवसर सृजित नही हो रहे हैं
प्रश्न : तो क्या 10% आरक्षण जिसे आर्थिक रूप से गरीब सवर्णो को दिया जा रहा है मात्र एक राजनीतिक दुराग्रह एवं राजनीतिक फायदे के लिए एक हथकंडे के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है
 
सरकार के पास कोई ठोस मैकेनिज्म नही है और इसकी शर्ते भी इतनी लिबरल है कि इसमें लगभग सभी सामान्य वर्ग के लोग आ जायेंगे।इसके अलावा यह कुछ वर्गों में जहाँ आर्थिक आधार पर आरक्षण देने जैसे नए बहस को जन्म दे सकती है तो दूसरी तरफ कुछ समुदाय (जैसे पाटीदार ,जाट ,मराठा आदि) की मांग को प्रबल बना सकती है।
 
जाट आरक्षण खत्म करने का फैसला देते हुए अदालत ने कहा था कि सिर्फ जाति पिछड़ेपन का आधार नहीं हो सकती.
राजस्थान सरकार ने 2015 में उच्च वर्ग के गरीबों के लिए 14 प्रतिशत और पिछड़ों में अति निर्धन के लिए पांच फीसदी आरक्षण की व्यवस्था की थी, उसे भी निरस्त कर दिया.
हरियाणा सरकार का भी ऐसा फैसला न्यायालय में नहीं टिक सका था. तो फिर क्या केंद्र सरकार के इस कदम का क्या होगा?केंद्र सरकार ने भी जो दांव चला है उसमें अनुसूचित जाति-जनजाति तथा पिछड़े वर्ग को मिल रहे आरक्षण से कोई छेड़छाड़ नहीं होगी बल्कि अलग से गरीब सवर्णों को आरक्षण दिया जाएगा.
 
सामाजिक चिंतकों का कहना है कि हमारे देश में जातिगत भेदभाव भी गरीबी और पिछड़ेपन का प्रमुख कारण रहा है, इसलिए यहां जाति के आधार पर आरक्षण का प्रावधान लागू किया गया. किंतु इससे असंतोष भी पैदा हुआ है और समाज के अनेक वर्ग अलग-अलग राज्यों में आर्थिक आधार पर आरक्षण की मांग के साथ आंदोलन कर रहे हैं. सरकार पर दबाव बना रहे हैं.
 
भारत में आरक्षण की व्यवस्था भारतीय संविधान के अनुच्छेद 15 और 16 में सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण का प्रावधान किया गया है, बशर्ते, ये साबित किया जा सके कि वे औरों के मुकाबले सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े हैं. इसे तय करने के लिए कोई भी राज्य अपने यहां पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन करके अलग-अलग वर्गों की सामाजिक स्थिति की जानकारी ले सकता है.
 
सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक आम तौर पर 50 प्रतिशत से ज्यादा आरक्षण नहीं हो सकता. सुप्रीम कोर्ट के फैसले के मुताबिक, कोई भी राज्य 50 प्रतिशत से ज्यादा आरक्षण नहीं दे सकता. आरक्षण की मौजूदा व्यवस्था के तहत एससी के लिए 15, एसटी के लिए 7.5 व अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए 27 फीसदी आरक्षण है. यहां आर्थिक आधार पर आरक्षण की कोई व्यवस्था नहीं है. इसीलिए अब तक जिन राज्यों में आर्थिक आधार पर आरक्षण देने की कोशिश हुई उसे कोर्ट ने खारिज कर दिया.
 
👉 भारत में आरक्षण का इतिहास
आजादी से पहले
* 1882 में प्राथमिक शिक्षा के क्षेत्र में हंटर कमीशन का गठन हुआ। महात्मा ज्योतिराव फुले ने वंचित तबके के लिए मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा की वकालत करते हुए सरकारी नौकरियों में आनुपातिक प्रतिनिधित्व की मांग की।
 
* 1891 में त्रावणकोर रियासत में सिविल नौकरियों में देसी लोगों की बजाय बाहरी लोगों को तरजीह देने के खिलाफ सरकारी नौकरियों में आरक्षण की मांग हुई।
 
* 1901-02 में कोल्हापुर रियासत के छत्रपति शाहूजी महाराज ने वंचित तबके के लिए आरक्षण व्यवस्था शुरू की। सभी को मुफ्त शिक्षा सुनिश्चित कराने के साथ छात्रों की सुविधा के लिए अनेक हॉस्टल खोले। उन्होंने ऐसे प्रावधान किए ताकि सभी को समान आधार पर अवसर मिल सके। देश में वर्ग-विहीन समाज की वकालत करते हुए अस्पृश्यता को खत्म करने की मांग की। 1902 में कोल्हापुर रियासत की अधिसूचना में पिछड़े/वंचित समुदाय के लिए नौकरियों में 50 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था सुनिश्चित की गई। देश में वंचित तबके के लिए आरक्षण देने संबंधी आधिकारिक रूप से वह पहला राजकीय आदेश माना जाता है।
 
* 1908 में अंग्रेजों ने भी प्रशासन में कम हिस्सेदारी वाली जातियों की भागीदारी बढ़ाने के प्रावधान किए।
 
आजादी के बाद:-
– अनुसूचित जातियों और जनजातियों को शुरुआत में 10 वर्षों के लिए आरक्षण दिया गया। उसके बाद से उस समय-सीमा को लगातार बढ़ाया जाता रहा है।
 
मंडल कमीशन :-
* मोरारजी देसाई के नेतृत्व वाली जनता पार्टी सरकार ने सामाजिक और शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों की पहचान करने के लिए 1979 में इस आयोग का गठन किया। उसके अध्यक्ष संसद सदस्य बिंदेश्वरी प्रसाद मंडल थे। आकलन के आधार पर सीटों के आरक्षण और कोटे का निर्धारण करना भी आयोग का मकसद था।
 
* इसके पास अन्य पिछड़े वर्गों (ओबीसी) में शामिल उप-जातियों का वास्तविक आंकड़ा नहीं था। आयोग ने 1930 के जनसंख्या आंकड़ों के आधार पर 1,257 समुदायों को पिछड़ा घोषित करते हुए उनकी आबादी 52 प्रतिशत निर्धारित की। 1980 में कमीशन ने अपनी रिपोर्ट सौंपते हुए इसमें पिछड़ी जातियों की हिस्सेदारी शामिल करते हुए कोटे की मौजूदा व्यवस्था को 22 प्रतिशत से बढ़ाते हुए 49.5 प्रतिशत तक करने का सुझाव दिया। इसमें ओबीसी के लिए 27 प्रतिशत का प्रावधान किया गया। 1990 में वीपी सिंह की सरकार ने इसके सुझावों को लागू किया।
 
* इसके विरोध में सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गई। कोर्ट ने आरक्षण व्यवस्था को वैधानिक ठहराते हुए व्यवस्था दी कि आरक्षण का दायरा 50 प्रतिशत से अधिक नहीं होना चाहिए।
 
संवैधानिक प्रावधान:-
* संविधान के भाग तीन में समानता के अधिकार की भावना निहित है। इसके अंतर्गत अनुच्छेद 15 में प्रावधान है कि किसी व्यक्ति के साथ जाति, प्रजाति, लिंग, धर्म या जन्म के स्थान पर भेदभाव नहीं किया जाएगा। 15(4) के मुताबिक यदि राज्य को लगता है तो सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े या अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के लिए वह विशेष प्रावधान कर सकता है।
 
* अनुच्छेद 16 में अवसरों की समानता की बात कही गई है। 16(4) के मुताबिक यदि राज्य को लगता है कि सरकारी सेवाओं में पिछड़े वर्गों को पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं है तो वह उनके लिए पदों को आरक्षित कर सकता है।
 
* अनुच्छेद 330 के तहत संसद और 332 में राज्य विधानसभाओं में अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए सीटें आरक्षित की गई हैं।

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