Government Must help in Judicial Reform(न्यायिक सुधार में सरकार का सहयोग जरूरी : पी. चिदंबरम)

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न्यायिक तंत्र चरमरा रहा है, किसी भी अदालत के किसी जज या वकील से पूछें, और वे आपको बताएंगे कि चेहरे पर ओढ़ी हुई मुस्कान वास्तविक नहीं है। आंकड़े कहानी बयान करते हैं।

आंकड़े

  • उच्च न्यायालयों के 1056 स्वीकृत पदों में से केवल 592 पदों पर जज कार्यरत हैं।
  • निचली अदालतों में जजों के(20,358 पदों में से) कुल पांच हजार पद रिक्त हैं।
  • विभिन्न स्तरों पर लंबित मामलों की तादाद इस प्रकार है:
  1. निचली अदालतों में: 2,64,88,405 (दिसंबर 2014)
  2. उच्च न्यायालयों में: 41,53,957 (दिसंबर 2014)
  3. सर्वोच्च न्यायालय में: 59,468 (फरवरी 2016)

अपर्याप्त जज, अनिच्छुक वकील

न्याय-तंत्र की समस्याओं को लेकर इतनी बार चर्चा व बहस हुई है, इतना अधिक विश्लेषण हो चुका है और इतनी रिपोर्टें आ चुकी हैं कि अगर स्पष्ट सुधार का कदम उठाने के बजाय उससे पहले एक और ‘अध्ययन’ का सुझाव कोई देता है तो उसे सिरे से खारिज कर दिया जाना चाहिए। समस्या की जड़ यह है कि हमारे पास जजों की संख्या बहुत कम है: प्रति साठ हजार की आबादी पर सिर्फ एक। हमें और जजों की जरूरत है। मांग तो है, पर आपूर्ति कहां है? तिस पर हमारे यहां ऐसी व्यवस्था है जिसमें जज ही जजों की नियुक्ति करते हैं। इस व्यवस्था के बारे में कुछ लोगों का कहना है कि यह संवैधानिक प्रावधान के उलट है।

फलस्वरूप जजों की नियुक्ति के तरीके को लेकर न्यायपालिका और कार्यपालिका/संसद के बीच प्रबल असहमति है। कुछ काबिल और कामयाब वकील जज की जिम्मेदारी उठाने को तैयार हैं। हाईकोर्ट के लिए सिर्फ जिला जजों में से चयन होता है। मगर निचली अदालतों में लंबे सेवाकाल के दौरान बहुत कम जज ऐसे होते हैं जिन किसी तरह के सच्चे या झूठे आरोप न हों। मजबूरी में, एक निश्चित तादाद में समय-समय पर जजों की नियुक्ति होती है, पर चयन की गुणवत्ता समान नहीं होती। न्यायिक ढांचे में आमूल सुधार की जरूरत है। हम कहीं से भी शुरू कर सकते हैं, पर अगर हम शीघ्र और नजर आने लायक परिणाम चाहते हैं तो शिखर से शुरू करना बेहतर होगा। इसीलिए तो राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग के पहले के प्रस्ताव और अब राष्ट्रीय अपीलीय अदालत गठित करने के नए प्रस्ताव ने काफी हिमायत हासिल की है।

अपीलीय अधिकार क्षेत्र

राष्ट्रीय अपीलीय अदालत (कोर्ट आॅफ अपील) क्यों? इसकी जरूरत रेखांकित करने वाली कई वजहें हैं- जजों की अपर्याप्त संख्या, अत्यधिक कार्य-भार, कानूनों की बहुतायत, ढेर सारे जटिल विवाद, नए न्यायिक क्षेत्राधिकार, आदि। फिर, उच्च न्यायालयों के फैसलों की गुणवत्ता ऊंची या समान नहीं होती। उनके काफी सारे फैसलों और आदेशों के खिलाफ अपील की जाती है। इसके अलावा, उच्च न्यायालयों को सौंपे गए नए न्यायिक अधिकार क्षेत्रों के मद््देनजर भी राष्ट्रीय अपीलीय अदालत की सख्त जरूरत है। अभी हालत यह है कि सुप्रीम कोर्ट में अपील के मामले उच्च न्यायालयों से भी पहुंचते हैं और विभिन्न अपीलीय पंचाटों (ट्रिब्यूनल्स) से भी। इसके लिए विशेष अनुमति प्राप्त करने की पहले की व्यवस्था समाप्त कर दी गई है।

संविधान का अनुच्छेद 136, जो अपील के लिए विशेष अनुमति का प्रावधान करता है, वास्तव में अपील की नियमित अनुमति की व्यवस्था बन गया है। सिर्फ सुप्रीम कोर्ट पहरेदार है, जो ज्यादातर विशेष अनुमति याचिकाओं को, मंजूरी के लिए होने वाली सुनवाई के स्तर पर ही खारिज कर देता है, अलबत्ता खारिज करने से पहले उसे मामले को सुनना पड़ता है। फिर भी, काम का बोझ लगातार बढ़ता जा रहा है, और इस तरह लंबित मामलों की तादाद भी बढ़ती जा रही है। दो-दो जजों के खंडपीठ मामलों की सुनवाई करें, इसके सिवा जजों के पास कोई चारा नहीं है।

अगर सचमुच सुप्रीम कोर्ट के संवैधानिक न्यायालय के दर्जे को बहाल करना है, तो इसे वैसे बहुत सारे कामों से मुक्त कर देना चाहिए जिन्हें यह अभी करता है- और एक दूसरी सक्षम संस्था (अदालत) बनानी चाहिए जो उस काम को कर सके। इसीलिए तो राष्ट्रीय अपीलीय अदालत संबंधी प्रस्ताव प्रासंगिक है। लगभग अस्सी फीसद विशेष अनुमति याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट द्वारा सुनी जाती हैं- जिनमें जमानत हासिल करने, जमीन-मकान खाली कराने या बेदखली से बचाने, मध्यस्थ नियुक्त कराने, अंतरिम आदेश पाने, आपराधिक या दीवानी मामलों में अपीलें या अंतरिम आदेश के लिए याचिका, श्रम व सेवा क्षेत्र तथा वैवाहिक और जमीन अधिग्रहण के विवाद आदि तमाम तरह के मामले होते हैं।

ये मामले राष्ट्रीय अपीलीय अदालत के द्वारा भी सुने जा सकते हैं और नतीजा उतना ही संतोषजनक होगा जितना कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लेकर होता है। हमारे पास उच्च न्यायालयों में ऐसे प्रतिष्ठित जज पर्याप्त संख्या में हैं जो राष्ट्रीय अपीलीय अदालत में पैंसठ साल की उम्र तक नियुक्त किए जा सकते हैं, जो उम्र-सीमा सुप्रीम कोर्ट के जज के लिए निर्धारित है। राष्ट्रीय अपीलीय अदालत के पांच क्षेत्रीय पीठों के लिए लगभग चालीस जजों की जरूरत होगी, और वे तीन साल ज्यादा सेवा का अवसर मिलने पर खुशी तथा गर्व अनुभव करेंगे।

संवैधानिक अदालत बहाली

इससे सुप्रीम कोर्ट के भी सुधार का रास्ता खुलेगा। पहले से अपेक्षया छोटी शीर्ष अदालत, जिसमें विशिष्ट न्यायविद-न्यायाधीशों की संख्या बीस से अधिक नहीं होगी; जिनका चुनाव जजों, न्यायविदों और वरिष्ठ वकीलों में से गहरी पड़ताल के बाद किया जाएगा; मामले की सुनवाई करने वाले हरेक खंडपीठ में कम से कम तीन जज होंगे; संवैधानिक पीठ नियमित रूप से काम करेगा; हर मामले को पहले से ज्यादा वक्त देकर सुना जाएगा; मामलों का तेजी से निपटारा होगा, सुविचारित फैसले आएंगे, जो पूरे देश के लिए कानून की नजीर रखेंगे। ये वे कुछ फायदे हैं जो सुधार से हमें हासिल होंगे। इसी के साथ-साथ, उच्च न्यायपालिका में श्रेष्ठतम प्रतिभाओं की नियुक्ति के लिए राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग के मसले को भी सुलझाया जाना चाहिए।

देश के प्रधान न्यायाधीश ने राष्ट्रीय अपीलीय अदालत (कोर्ट आॅफ अपील) का प्रस्ताव रखा था, पर मुझे बहुत निराशा हुई जब सरकार ने फौरन उसे खारिज कर दिया। मैं उम्मीद करता हूं कि वह प्रस्ताव अभी कायम है और उस पर बहस होगी। न्यायिक ढांचे के जटिल मसले को सुलझाने में यह संकल्पना (कोर्ट आॅफ अपील) मुकदमों के भारी बोझ से सांसत में पड़े सुप्रीम कोर्ट की मुक्ति की शुरुआत और सही मायने में संवैधानिक न्यायालय की बहाली का उपाय साबित होगी। यह हो जाए तो फिर अन्य सुधार भी शीघ्र किए जाएं। 

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